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सबरीमाला मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने क्यों किया “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” शब्द का प्रयोग

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले से जुड़े रेफरेंस की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने अहम टिप्पणी कर “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” शब्द का इस्तेमाल किया। यह टिप्पणी तब आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल अदालत में धार्मिक अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े तर्क रख रहे थे और विभिन्न स्रोतों से विचारों का हवाला दे रहे थे
वरिष्ठ अधिवक्ता कौल ने दलील दी कि ज्ञान और विचार किसी भी माध्यम से आए हों, उन्हें पूरी तरह खारिज नहीं करना चाहिए। वे अखबार में प्रकाशित एक लेख और विभिन्न विचारकों के मतों का उल्लेख कर रहे थे, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम की बात कही गई थी। इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत सभी विद्वानों और लेखकों का सम्मान करती है, लेकिन कोई भी लेख या व्यक्तिगत राय न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं होती।

तभी बहस के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने हल्के अंदाज में कहा, “लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं,” उनकी इस टिप्पणी से संदेश दिया गया कि अदालत में केवल प्रमाणित, विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य स्रोतों पर ही भरोसा किया जा सकता है, न कि अपुष्ट या सोशल मीडिया आधारित जानकारी पर।
मामले की पृष्ठभूमि में दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से दायर याचिका शामिल है, जिसमें धार्मिक बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन) की प्रथा को चुनौती दी गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता कौल समुदाय की ओर से पेश हो रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत धार्मिक संप्रदायों को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार प्राप्त है और इसे हर स्थिति में अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत राज्य के सामाजिक सुधार कानूनों के अधीन नहीं माना जाना चाहिए। कौल ने तर्क दिया कि पहले के न्यायिक निर्णय, जैसे ‘देवरू’ फैसला, केवल मंदिर प्रवेश से जुड़े मामलों तक सीमित थे और उन्हें सभी धार्मिक अधिकारों पर लागू सामान्य सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलित व्याख्या यानी “हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन” की आवश्यकता पर जोर दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि जब राज्य अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाता है, तो धार्मिक अधिकारों को पूर्ण और सर्वोपरि नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि ये अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन होते हैं, और इन्हीं आधारों पर सामाजिक सुधार संभव होता है। कौल ने इस तर्क से सहमति जाहिर की। इसके साथ ही कौल ने “संवैधानिक नैतिकता” की व्याख्या पर भी चिंता जताई और कहा कि इस अनावश्यक रूप से विस्तृत अर्थ देने से संवैधानिक प्रावधानों का दायरा बदल सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि गलत प्रथाओं को रोकने के लिए सार्वजनिक नैतिकता पर्याप्त आधार है।

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