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कंपनियां बताएं सबसे पहले वीडियो किसने डाला था? अब 6 जुलाई को सुनवाई
नई दिल्ली। दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल की कानूनी उलझनें और बढ़ती नजर आ रही हैं। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच से खारिज होने के बाद अब कोर्ट में जिरह के दौरान बने वीडियो ने विवाद खड़ा कर दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को आम आदमी पार्टी के संयोजक, पार्टी के अन्य नेताओं, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और पत्रकार रवीश कुमार के खिलाफ दाखिल एक जनहित याचिका पर संज्ञान लिया।
कोर्ट ने सख्त निर्देश देते हुए सोशल मीडिया से संबंधित सभी वीडियो हटाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने जांच के दायरे को बढ़ाते हुए यह भी सवाल किया है कि आखिर इस वीडियो को सबसे पहले इंटरनेट पर किसने डाला था? हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि इस तरह की रिकॉर्डिंग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए तय किए गए नियमों का उल्लंघन है, जिसे सोशल मीडिया पर साझा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
वकील की याचिका पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल, आप नेताओं, दिग्विजय सिंह और रवीश कुमार को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस पूरे प्रकरण पर अब अगली सुनवाई 6 जुलाई को तय की गई है। पहले इस मामले को जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस कारिया की पीठ के सामने सूचीबद्ध किया था, लेकिन जस्टिस कारिया ने खुद को अलग कर लिया तो दूसरी बेंच के सामने भेज दिया।
फेसबुक-इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा और यूट्यूब की पैरेंट कंपनी गूगल के वकीलों ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। जब कोर्ट ने यह जानना चाहा कि क्या उस व्यक्ति का पता लगाया जा सकता है जिसने सबसे पहले वीडियो डाला था, तो मेटा ने साफ कहा कि उनके पास ऐसा कोई सीधा तरीका मैकेनिज्म नहीं है जिससे शुरुआती अपलोडर की तुरंत पहचान हो सके। हालांकि, मेटा ने बताया कि उनके पास यूआरएल और आईपी लॉग की जानकारी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी यूजर का ईमेल या मोबाइल नंबर मिलता है, तो वे उसके सिस्टम और आईपी एड्रेस से जुड़ी सूचनाएं अदालत को दे सकते हैं, क्योंकि अकाउंट बनाते समय ये विवरण जरूरी होते हैं।
गूगल ने कोर्ट को बताया कि रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जो 13 लिंक यूआरएल उपलब्ध कराए गए थे, उन्हें प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया है। वहीं मेटा ने साफ किया कि जब भी किसी अवैध सामग्री की शिकायत मिलती है, तो संबंधित एजेंसियां उनसे संपर्क करती हैं और वे उस पर कार्रवाई करते हैं। कोर्ट ने इस पर सवाल किया कि क्या भविष्य में दिए गए निर्देशों के आधार पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद ऐसे सभी लिंक को हटाया जा सकता है? कोर्ट ने सवाल उठाया कि इन कंपनियों को हर बार निर्देश देने की जरूरत क्यों पड़ती है, वे खुद से ऐसी सामग्री क्यों नहीं हटाते?
अंत में हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए इन कंपनियों को अगली सुनवाई में पूरी जानकारी के साथ आने को कहा है, ताकि यह साफ हो सके कि सबसे पहले वीडियो किसने अपलोड किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून का उल्लंघन करने वाली किसी भी सामग्री को फैलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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