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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में शांति, भाईचारे और सुरक्षा को लेकर दो महत्वपूर्ण स्वर उभरे हैं। एक ओर नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की वकालत करते हुए घाटी के पुराने स्वरूप को बहाल करने पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने नशे के कारोबार और आतंकवाद के गठजोड़ को खत्म करने के लिए निर्णायक युद्ध का शंखनाद किया है।एक पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि कश्मीर सभी समुदायों का साझा घर है और पंडितों के बिना यह अधूरा है। उन्होंने 1990 के दशक में हुए पलायन को क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा मानवीय और सांस्कृतिक नुकसान बताया।
अब्दुल्ला ने भावुक होते हुए कहा, मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि जो लोग यहां से चले गए, वे अपने घरों को वापस लौटें और एक बार फिर खुशहाली से रहें। कश्मीर की असली पहचान हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों का आपसी मेलजोल ही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि घाटी में जल्द ही वह दौर वापस आएगा जब सभी समुदाय पुराने गौरव और भाईचारे के साथ एक साथ रहेंगे। घाटी के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने की इस अपील के बीच, प्रशासन सुरक्षा और युवाओं के भविष्य को लेकर बेहद सतर्क है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने केंद्र शासित प्रदेश में बढ़ते नशे के कारोबार को एक रणनीतिक साजिश करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नशीली दवाओं का व्यापार सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़ा है, जिसका उद्देश्य युवाओं को बर्बाद करना और नारको-टेरर के जरिए अशांति फैलाना है। प्रधानमंत्री के नशा मुक्त भारत अभियान के तहत उपराज्यपाल ने एक विशेष 3पी रणनीति को लागू किया है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य ड्रग सप्लाई चेन को ध्वस्त करना, शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फैलाना और नशे के शिकार युवाओं का प्रभावी पुनर्वास करना है। प्रशासन का मानना है कि सीमाओं पर सक्रिय सप्लाई चेन को तोड़ना न केवल युवाओं को बचाएगा, बल्कि आतंकवाद की फंडिंग पर भी करारी चोट करेगा। अब यह अभियान एक जन आंदोलन का रूप ले चुका है, जिसमें पुलिस और जनता के बेहतर तालमेल से सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं।

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