
अंतरराष्ट्रीय बाजार, टैक्स और वैश्विक संकटों ने तय की भारत में ईंधन की कीमतें
नई दिल्ली। भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वर्ष 2009 से 2025 तक के औसत आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, सरकारी टैक्स नीति और वैश्विक राजनीतिक घटनाओं का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ा। इस दौरान जहां कुछ वर्षों में ईंधन सस्ता हुआ, वहीं कई दौर ऐसे भी आए जब आम जनता को रिकॉर्ड महंगे पेट्रोल और डीजल का सामना करना पड़ा।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009 में पेट्रोल की औसत कीमत करीब 48 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत लगभग 32 रुपये प्रति लीटर थी। इसके बाद 2011 से 2014 के बीच ईंधन कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। वर्ष 2012 में पेट्रोल औसतन 68.6 रुपये और डीजल 45.1 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया। इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहीं, जो पिछले डेढ़ दशक का सबसे महंगा दौर माना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार 2011–2013 के दौरान पश्चिम एशिया में राजनीतिक अस्थिरता, ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और वैश्विक मांग बढ़ने के कारण कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। उस समय भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह थे। महंगे कच्चे तेल का असर भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर भी साफ दिखाई दिया।
हालांकि 2015 और 2016 में स्थिति बदली। अमेरिका में शेल ऑयल उत्पादन बढ़ने और ओपेक देशों द्वारा उत्पादन कम नहीं करने के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई। वर्ष 2016 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 43.7 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसका असर भारत में भी दिखाई दिया और पेट्रोल लगभग 64 रुपये तथा डीजल करीब 50 रुपये प्रति लीटर के आसपास रहा।
इसके बाद 2020 में कोविड-19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दिया। लॉकडाउन और परिवहन गतिविधियां बंद होने से तेल की मांग अचानक गिर गई। उस वर्ष कच्चा तेल करीब 42 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो कई वर्षों का न्यूनतम स्तर था। लेकिन इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अपेक्षित कमी नहीं आई, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारों ने टैक्स संरचना में बदलाव किए थे।
वर्ष 2021 के बाद ईंधन कीमतों में फिर तेजी शुरू हुई। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई संकट पैदा हुआ और ब्रेंट क्रूड फिर 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। भारत में पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 95 रुपये और डीजल करीब 86 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया। 2023 से 2025 के बीच भी कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं और कई शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर से ऊपर बिकता रहा।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है, इसलिए वैश्विक कीमतों में होने वाला हर बदलाव सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल वाहन चालकों तक सीमित मुद्दा नहीं, बल्कि देश की महंगाई और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा विषय बन चुकी हैं।
विश्लेषकों के अनुसार 2026 में कच्चे तेल की कीमतें 55 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहने का अनुमान है। हालांकि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां, युद्ध और उत्पादन नीतियां आने वाले समय में ईंधन बाजार की दिशा तय करेंगी।
भारत में 2009 से 2025 तक पेट्रोल और डीजल की अनुमानित वार्षिक औसत कीमतों की तालिका
वर्ष पेट्रोल औसत कीमत (रुपये/लीटर) डीजल औसत कीमत (रुपये/लीटर)
2009 48 32
2010 52 37
2011 63.8 41.3
2012 68.6 45.1
2013 72.3 48.6
2014 72.4 53.1
2015 60.5 50.0
2016 64.4 50.5
2017 70.0 57.5
2018 78.5 68.0
2019 73.8 65.9
2020 80.4 68.0
2021 95.4 73.9
2022 95.0 86.7
2023 98.0 89.6
2024 100.0 88.0
2025 105.0 90.0
वर्षवार औसत कच्चे तेल की कीमत (ब्रेंट क्रूड)
वर्ष औसत कीमत (USD प्रति बैरल)
2009 61.5
2010 79.5
2011 111.3
2012 111.6
2013 108.6
2014 99.0
2015 52.3
2016 43.7
2017 54.3
2018 71.3
2019 64.3
2020 42.0
2021 70.9
2022 100.9
2023 82.5
2024 80
2025 72–78
2026 अनुमानित 55–85
