कोर्ट ने कहा- किसी को ऐसे नहीं घोषित कर सकते विदेशी

नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के 28 फैसलों को एक साथ रद्द करते हुए एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। इन फैसलों में विदेशी न्यायाधिकरणों (फॉरेन ट्रिब्यूनल) द्वारा 27 व्यक्तियों को विदेशी साबित करने के आदेशों को सही ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की नागरिकता या विदेशी होने की स्थिति का निर्धारण एक ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए जो संवैधानिक नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार निष्पक्ष, वैध और तर्कसंगत हो। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सोमवार को सुनाए गए अपने फैसले में इन सभी मामलों को नए सिरे से कानूनी रूप से निर्धारित करने के लिए संबंधित विदेशी न्यायाधिकरणों को वापस भेज दिया। न्यायालय ने कहा, इसलिए, इन सभी मामलों में हाई कोर्ट द्वारा दिए गए विवादित फैसलों एवं आदेशों को रद्द किया जाता है। संबंधित विदेशी न्यायाधिकरण या पहले के अवैध प्रवासी (निर्धारण) न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए संबंधित विचारों एवं आदेशों को भी रद्द किया जाता है।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकता और विदेशी होने का दर्जा संवैधानिक और कानूनी रूप से बहुत अहम है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने राज्य सरकार को नसीहत देते हुए कहा कि यह राज्य की जायज़ एवं आवश्यक जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे कि जो लोग कानूनी रूप से भारतीय नागरिकता का दावा करने के हकदार नहीं हैं, वे प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करके, झूठे दावे करके या प्रक्रिया में होने वाली देरी का फायदा उठाकर यह दर्जा हासिल न कर सकें। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि राज्य को यह पक्का करना चाहिए कि इस तरह की स्थिति का फैसला एक ऐसी प्रक्रिया से हो जो निष्पक्ष, कानूनी एवं तर्कसंगत हो। विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा नौ के तहत कानूनी जिम्मेदारी पूरी तरह से लागू है। अपीलकर्ताओं की मुख्य शिकायत यह थी कि उन्हें एकतरफा या लगभग एकतरफा कार्यवाही में विदेशी घोषित कर दिया गया, जबकि उन्हें अपने भारतीय नागरिक होने का सबूत देने का पर्याप्त और सार्थक मौका नहीं दिया गया।
विदेशी घोषित किए जाने का नतीजा कोई ‘मामूली सिविल परिणाम’ नहीं होता
अदालत ने कहा कि एकतरफा कार्यवाही में भले ही अनुपस्थित पक्ष की भागीदारी न हो, लेकिन इससे न्यायाधिकरण द्वारा निष्पक्ष विचार और सार्थक निर्णय लेने की आवश्यकता खत्म नहीं हो जाती। न्यायाधिकरण को स्वतंत्र रूप से यह सुनिश्चित करना होगा कि सही प्रक्रिया का पालन किया गया है, राज्य द्वारा पेश किए गए सबूतों की जांच करनी होगी, और किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने से पहले इसके कारण दर्ज करने होंगे। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी घोषित किए जाने का नतीजा कोई ‘मामूली सिविल परिणाम’ नहीं होता। इसके कारण हिरासत में लिया जा सकता है, देश से निकाला जा सकता है, परिवार एवं समुदाय से अलग होना पड़ सकता है, और कुछ मामलों में तो व्यक्ति के पास कोई नागरिकता नहीं रहने की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
