अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित सांसदों को भेजा नोटिस

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 20 बागी सांसदों की सदस्यता को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संबंधित सांसदों को नोटिस जारी कर बड़ा कदम उठाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन 20 सांसदों को नोटिस जारी किया है। बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से इन सांसदों के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का निर्देश देने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और लोकसभा के महासचिव को नोटिस जारी करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह उनकी ओर से अदालत में मौजूद हैं। दरअसल अभिषेक बनर्जी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि 20 सांसदों के खिलाफ शुरू की गई अयोग्यता की कार्यवाही पर फैसला लेने में देरी की जा रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से लोकसभा अध्यक्ष को संविधान के दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश देने की मांग की है।
बनर्जी ने पहले इन सांसदों के खिलाफ अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की थीं। इसके बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से इन मामलों का जल्द निपटारा करने का आग्रह किया। बताया गया है कि उन्होंने 27 जुलाई को लिखित रिमाइंडर भेजा था और 12 अगस्त को इस मुद्दे पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात भी की थी।
20 सांसदों के दूसरे संगठन से जुड़ने पर विवाद……..
विवाद टीएमसी के संसदीय दल में बगावत के बाद शुरू हुआ। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने घोषणा की कि वे त्रिपुरा स्थित राजनीतिक संगठन नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गए हैं या उसका विलय कर लिया है। बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दिए जाने की मांग भी की है। ऐसे में टीएमसी ने तर्क दिया, कि ये सांसद पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। ऐसे में किसी दूसरे राजनीतिक संगठन के साथ जुड़ना स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ने के समान है और उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है। वहीं, बागी सांसदों का कहना है कि उनका कदम कानून के तहत वैध विलय है। इसी मतभेद के कारण सांसदों की सदस्यता का मामला अब सुप्रीम कोर्ट के सामने है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद सवाल उठाया जा रहा है कि क्या बागी सांसदों की सदस्यता बची रहेगी?
शिवसेना (यूबीटी) का मामला भी लंबित………….
सुप्रीम कोर्ट में दलबदल से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण मामला भी चल रहा है। शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अपने छह सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दिए जाने को चुनौती दी है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ कर रही है।
