
मुंबई । महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने का मामला अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। चार ड्राइवरों ने राज्य सरकार के इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करने या उसे बनाए रखने के लिए किसी विशेष भाषा के ज्ञान को अनिवार्य नहीं किया गया है। ऐसे में राज्य सरकार भाषा के आधार पर लाइसेंस या परमिट पर कार्रवाई नहीं कर सकती।
याचिका में कहा गया है कि सरकार का यह आदेश संविधान में दिए गए समानता के अधिकार और रोजगार एवं पेशा करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है। ड्राइवरों ने संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का भी हवाला दिया है। उनका कहना है कि भाषा की अनिवार्यता से बड़ी संख्या में गैर-मराठी भाषी और प्रवासी चालकों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
महाराष्ट्र सरकार ने 12 अगस्त को ऑटो, टैक्सी और अन्य सार्वजनिक परिवहन चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान अनिवार्य करने संबंधी अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों ने भाषा की जानकारी की जांच शुरू कर दी है और नियम पूरा नहीं करने वाले चालकों को नोटिस भी दिए जा रहे हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि इस नियम से करीब 10 लाख चालकों की आजीविका पर असर पड़ सकता है। ड्राइवरों ने अदालत से सरकार की अधिसूचना पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। बॉम्बे हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई 27 अगस्त को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष होने की संभावना है।
