वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिक वैधता पर तीन हफ्ते बाद अंतिम सुनवाई

नई दिल्ली । वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही संवैधानिक चुनौती पर बुधवार को सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कानून में वैवाहिक बलात्कार का अपवाद मौजूद है, तो पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप में पति के खिलाफ अभियोजन किस आधार पर चलाया जा सकता है।
पीठ ने पूछा कि जब तक वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं कर देता, तब तक पत्नी से बलात्कार के आरोप में पति के खिलाफ मुकदमा कैसे चल सकता है? जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी इसी पहलू पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि आईपीसी की धारा 375 में स्पष्ट रूप से वैवाहिक बलात्कार का अपवाद था, तो उसकी संवैधानिक वैधता पर फैसला होने तक अभियोजन की अनुमति दी जा सकती है या नहीं।
पीड़ितों की सुरक्षा पर भी कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, लेकिन मौजूदा कानूनी प्रावधानों के रहते अभियोजन के अधिकार का सवाल भी महत्वपूर्ण है। यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें कहा गया था कि वैवाहिक बलात्कार के मामले में पति को कानून के तहत पूर्ण छूट हासिल नहीं है। हाईकोर्ट ने पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी।
बीएनएस में भी वैवाहिक बलात्कार का अपवाद
मामला मूल रूप से आईपीसी की धारा 375 के अपवाद-2 से जुड़ा है। अब आईपीसी की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 लागू है। बीएनएस में भी 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति के यौन संबंध को लेकर समान अपवाद मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अंतिम सुनवाई में दो प्रमुख सवालों पर विचार होगा। पहला, यदि वैवाहिक बलात्कार का अपवाद बरकरार रहता है तो क्या पति के खिलाफ अभियोजन जारी रखा जा सकता है। दूसरा, क्या यह अपवाद संविधान की कसौटी पर कायम रह सकता है।
केंद्र ने अपराध बनाने का किया था विरोध
केंद्र सरकार ने 2024 में दाखिल हलफनामे में वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने का विरोध किया था। केंद्र का कहना था कि विवाहित महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने के लिए मौजूदा कानूनों में पर्याप्त वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं। सरकार के अनुसार विवाह संस्था के भीतर बलात्कार का अपराध लागू करना अत्यधिक कठोर और असंगत हो सकता है तथा यह मुख्य रूप से सामाजिक और विधायी नीति का विषय है।
