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अमेरिकी कोर्ट ने पति की गैर-मौजूदगी में विवाह खत्म करने का दिया था आदेश

नई दिल्ली । साकेत स्थित फैमिली कोर्ट ने साफ कर दिया है कि यदि किसी विदेशी अदालत द्वारा एकतरफा कार्यवाही में तलाक दिया गया हो और भारतीय पति या पत्नी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर न मिला हो, तो ऐसे फैसले भारत की अदालतों में निर्णायक या लागू करने योग्य नहीं माने जाएंगे। यह फैसला उन भारतीयों के लिए एक मिसाल कायम करता है जो विदेशी धरती पर वैवाहिक विवादों का सामना कर रहे हैं, विशेषकर जब वे अपने संवैधानिक अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से वंचित किए जाते हैं।
फैमिली कोर्ट की जज पूर्वा सरीन ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले में की जिसमें पत्नी ने अमेरिका की एक फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। अमेरिकी कोर्ट ने पति की गैर-मौजूदगी में विवाह को समाप्त करने का आदेश दिया था। तलाक का आधार शादी का पूरी तरह टूट जाना बताया गया था। साकेत कोर्ट ने साफ किया कि भारत में केवल यह कहना कि पति-पत्नी का रिश्ता पूरी तरह टूट चुका है, अपने आप में तलाक का वैधानिक आधार नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी पूरी तरह टूट जाने के आधार पर तलाक देने की शक्ति सामान्य फैमिली कोर्ट के पास नहीं है। यह शक्ति केवल सुप्रीम कोर्ट के पास विशेष परिस्थितियों में निहित है, जिसका अर्थ यह नहीं कि भारत की निचली अदालतें इसी आधार को सामान्य तलाक का आधार मान लें।
बता दें दंपति ने 20 दिसंबर 2015 को साकेत स्थित आर्य समाज मंदिर में शादी की थी, जिसका पंजीकरण बाद में जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में कराया गया। कुछ समय बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ने लगे और पत्नी अमेरिका चली गई, जहां उसने तलाक की कार्यवाही शुरू की। उसने अमेरिकी अदालत से तलाक के साथ-साथ बच्चे की कस्टडी और गुजारा भत्ता भी मांगा। पति ने भारत में फैमिली कोर्ट का रुख करते हुए वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका दाखिल की, जिसमें उसने पत्नी को वापस वैवाहिक घर लौटने और नाबालिग बेटे के साथ रहने का निर्देश देने की मांग की थी।
साकेत कोर्ट ने अमेरिकी फैसले की जांच करते हुए पाया कि विदेशी अदालत की कार्यवाही एक्स-पार्टी थी, जिसका अर्थ है कि पति को अपना बचाव प्रस्तुत करने और अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि किसी विदेशी अदालत का फैसला तभी भारत में निर्णायक माना जा सकता है जब वह भारतीय कानून में तय शर्तों पर खरा उतरता हो।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अमेरिकी अदालत ने तलाक ऐसे आधारों पर दिया, जिन्हें भारत में तलाक के लिए मान्यता प्राप्त नहीं है और पति को सुनवाई का अवसर भी नहीं मिला। इसलिए, यह फैसला अपवादों के दायरे में आता है। अदालत ने साफ किया कि अमेरिकी कोर्ट में तलाक का फैसला भारत में निर्णायक नहीं है और भारतीय अदालतों में इसे लागू नहीं माना जाएगा। साकेत कोर्ट ने पति को राहत देते हुए उसे भारत में वैवाहिक अधिकारों की बहाली की याचिका या कानून के तहत कोई अन्य उचित याचिका जारी रखने की स्वतंत्रता दी है।

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