कोर्ट ने इस तरह किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलावों पर कड़ा रुख दिखाकर साफ किया कि उसने इस तरह के किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी देकर कहा कि अगर कोई गैर-कानूनी काम हुआ है, तब उसके नतीजे भुगतना होगा। यह टिप्पणी स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार की शक्तियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई।
मामले की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट की बेंच को जब एसआईआर प्रक्रिया के तहत फॉर्म-6 में किए गए बदलावों के बारे में बताया गया, तब भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत ने इसतरह के किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट यह पता लगाने के लिए रिकॉर्ड की जांच करना चाहता है कि यह बदलाव आखिर किसने किए थे। दरअसल, विवाद चुनाव आयोग के एक अतिरिक्त एसआईआर घोषणापत्र से जुड़ा है, जिसमें नए मतदाताओं को पुरानी मतदाता सूची से जोड़ने की जरुरत होती है। जहां चुनाव आयोग ने इस केवल एक एनेक्शर बताया था, वहीं आलोचकों का तर्क था कि इसने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना एक कानूनी फॉर्म को बदल दिया है।
सीनियर वकील मेनका गुरुस्वामी ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह चुनौती एक राष्ट्रीय संस्था के तौर पर चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़ी है और देश में निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनावों के माहौल पर असर पड़ रहा है। गुरुस्वामी ने दिल्ली और बंगाल का उदाहरण देकर बताया कि एसआईआर से दिल्ली में 30 लाख और बंगाल में 90 लाख मतदाता प्रभावित हुए हैं, इस प्रक्रिया ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के वोटिंग अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से उन फैसलों का रिकॉर्ड पेश करने को कहा है, ताकि यह देखा जा सके कि वे निर्णय सिर्फ ज्ञानेश कुमार ने लिए थे या चुनाव आयोग ने बहुमत से अथवा सर्वसम्मति से पारित किए थे। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि अगर ईसीआई का जवाब देखने के बाद उन्हें लगता है कि सीईसी ने कुछ फैसले आवश्यक आम सहमति के बिना लिए थे, तब वह उन फैसलों पर फिर से विचार कर सकता है या उन्हें वापस ले सकता है। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि अगर कोई आम सहमति नहीं बनती है, तब फैसला बहुमत से होना चाहिए, अन्यथा उस फैसले को रद्द किया जा सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने के लिए कोई अंतरिम आदेश जारी करने से इंकार किया। पटना के राकेश कुमार सिंह की याचिका में आरोप लगाया गया था कि सीईसी ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा फैसले लिए थे और कई गाइडलाइंस तथा सॉफ्टवेयर में बदलाव किए थे। इस पर सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील विकास सिंह से कहा कि उनकी दलीलें सिर्फ एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित हैं। सीजेआई ने कहा, रिपोर्ट सही हो सकती है या गलत, लेकिन हम उसके आधार पर कोई आदेश नहीं दे सकते। हमें उनके (ईसीआई) जवाब का इंतजार करना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब रिकॉर्ड पेश किया जाएगा, तभी वह तय करेगी कि फॉर्म-6 में बदलाव किसने किया।
