
लाॅ जर्नल्स में भी प्रकाशित होगा हाइकोर्ट का यह फैसला:
इन्दौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय इन्दौर खंडपीठ में न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर की एकल पीठ ने एक याचिका का निराकरण करते हुए कहा कि- दोषमुक्ति सिर्फ दोषमुक्ति होती है। सम्मानजनक और असम्मानजनक जैसा कुछ नहीं होता।- याचिकाकर्ता के वकील धर्मेन्द्र चेलावत के अनुसार अब यह फैसला ला जर्नल्स में भी प्रकाशित होगा। एड्वोकेट धर्मेंद्र चेलावत के अनुसार प्रकरण कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि याचिकाकर्ता रवि नरवरिया ने वर्ष 2018 में कांस्टेबल भर्ती परीक्षा में शामिल हों आवेदन फार्म के साथ शपथ पत्र देते बताया था कि उसके खिलाफ माधव नगर पुलिस थाने में भादवि की धारा 452, 294, 323, 506, 34 के तहत प्रकरण दर्ज हुआ था और इसमें वह बरी हो चुका है क्योंकि शिकायतकर्ता खुद कोर्ट में अपने बयान से पलट गया था। एडवोकेट चेलावत के अनुसार याचिकाकर्ता परीक्षा में चयनित हो गया था और उसका 34वीं बटालियन के लिए नियुक्ति पत्र भी जारी हो गया था । वह नौकरी ज्वाइन करने पहुंचा तो उसे नियुक्ति निरस्ती का बताते नियुक्ति निरस्ती आदेश थमा दिया। नियुक्ति निरस्ती के आदेश में कहा था कि चूंकि याचिकाकर्ता प्रकरण में इसलिए बरी हुआ है क्योंकि शिकायतकर्ता बयान से पलट गया था, इसलिए याचिकाकर्ता की दोषमुक्ति को सम्मानजनक नहीं माना जा सकता। नियुक्ति निरस्ती के आदेश को चुनौती हुए रवि नरवरिया ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर तर्क रखा कि विचारण न्यायालय के समक्ष शिकायतकर्ता ने खुद स्वीकारा है कि आरोपित ने उसके सामने कोई अपराध नहीं किया था। न्यायालय में गुणदोष पर विचार करने के बाद ही याचिकाकर्ता को दोषमुक्त घोषित किया था। याचिकाकर्ता की बात से सहमत हो कोर्ट ने याचिका का निराकरण करते हुए कहा कि दोषमुक्ति सिर्फ दोषमुक्ति होती है। सम्मानजनक और असम्मानजनक जैसा कुछ नहीं होता। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को नियुक्ति दिनांक से वरिष्ठता के लाभ देने के लिए भी कहा है।
