
मातृत्व सुरक्षा और शिशु सुरक्षा संबंधी बैठक में दिये निर्देश
दमोह । सुरक्षा और शिशु सुरक्षा राज्य सरकार की और जिला प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओ में से एक है। किसी भी गर्भवती महिला को इलाज, उपचार, जांच आदि में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना ना करना पड़े। उनके और उनके बच्चे के जीवन को बचा लें, ये हमारे लिए सर्वोपरि है। इसी प्रकार अब बच्चों को लेकर भी यही बात है कि बच्चे के जन्म के बाद से लेकर के जब तक वो 6 साल का होता है तब तक वो कुपोषित न रहे और उसका टीकाकरण ठीक से हो, इन सारी चीजों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है ताकि माँ और बच्चा दोनों सवस्थ रहें और किसी पर किसी भी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव ना हो। यह बात कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर ने कलेक्टर कार्यालय के सभाकक्ष में आयोजित स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक के दौरान कही। इस अवसर पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मुकेश जैन सहित चिकित्सकगण और स्वास्थ्य अमला मौजूद था। कलेक्टर श्री कोचर ने कहा राज्य सरकार ने एक व्यवस्था बनाई है की यदि किसी कारण से किसी गर्भवती महिला की मृत्यु होती है या फिर किसी बच्चे की मृत्यु होती है, नवजात शिशु की या छोटे बच्चे की मृत्यु होती है, तो ऐसे केस में इसकी समीक्षा की जाती है, हर मृत्यु की बहुत बारीकी से समीक्षा की जाती है की ऐसा क्यों हुआ और इसके लिए कौन से कारण जिम्मेदार है। इसके लिए राज्य शासन ने इसमें बहुत जरूरी व्यवस्था की है। जब यह समीक्षा होती है तो केवल अधिकारी समीक्षा नहीं करते है, उस समीक्षा में उस गर्भवती महिला के या उस बच्चे के परिजनों को भी बुलाया जाता है, ताकि वो भी पूरी प्रक्रिया को देख सके और वो भी अपने विचार व्यक्त कर सके।कलेक्टर श्री कोचर ने कहा इस प्रोविजन को जिले में पहली बार लागू किया है। मातृत्व सुरक्षा की बैठक में जो गर्भवती महिलाओं की मृत्यु हुई थी जून और जुलाई माह में, उनमें बहुत गहनता से समीक्षा की और चार या पांच केसेस में परिजन भी उपस्थित हुए है।
कलेक्टर श्री कोचर ने यह निर्णय लिया है की जिसमें परिजन नहीं आएँगे, उनकी समीक्षा को स्थगित रखेंगे, जब परिजन आएँगे तभी वो समीक्षा की जायेगी। अगली बार फिर अगले हफ्ते फिर से समीक्षा होगी, जितनों के परिजन आएँगे, उन सब की समीक्षा की जायेगी। यह बहुत ही पारदर्शी तरीका है किसी चीज़ को करने का जिसमें लोगों ने बहुत डिटेल्ड फॉर्मेट बनाया है, यदि कोई महिला गर्भवती है, तो उसकी सबसे पहले गर्भवती होने का पता कब चला, उसकी पहली जांच कब हुई, फिर दूसरी जांच, तीसरी जांच और फिर चौथी जांच कब हुई, जो चारों अनिवार्य जांचें है, वह हुई या नही हुई, किस जांच के दौरान कॉम्प्लिकेशन का पता चला की क्या प्रॉब्लम हुई थी, फिर उसके बाद उसका ट्रीटमेंट कैसे हुआ। इन सारे लेवल पर इसको देखा जाता हैं की आंगनवाड़ी स्तर पर क्या किया जब उसकी जांच हुई, इसके बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्तर पर क्या हुआ, फिर जिला अस्पताल के स्तर पर क्या हुआ और उनको रेफर किया गया या नहीं किया गया और फिर उसमें मृत्यु के कारणों की बहुत डिटेल्ड में बारीकी से छानबीन और जांच की जाती है।
उन्होंने कहा इसमें जो पूरा वस्तुस्थिति का प्रतिवेदन रहता है, उसके बाद जो डॉक्टर्स हैं, जिन्होंने उनको ट्रीट किया है, जो बी.एम.ओ. है और जो स्पेशलिस्ट डॉक्टर हैं इसके अलावा डी.एच.ओ, सी.एम.एच.ओ, इन सबके ओपिनियन यानी की उनका अभिमत भी लिखा हुआ हैं और उसके बाद में सबसे आखिरी में कलेक्टर का अभिमत लिखा जाता हैं, कलेक्टर के अभिमत के साथ यह पूरी रिपोर्ट राज्य शासन को जाती हैं। उन्होंने कहा जनवरी 2024 से लेकर के सितंबर 2024 तक के सारे मातृ मृत्यु वाले और शिशु मृत्यु वाले दोनों केसेस लिये जायेंगे। जो परिजन आते हैं, उनके लिए 200 रूपये का मानदेय सरकार ने निर्धारित किया है, जो भी एक व्यक्ति आता है उनके यहाँ से, उसको ये मानदेय देने की व्यवस्था सरकार के नियम अनुसार की है, यह एक बहुत ही स्वस्थ और पारदर्शी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से जिनके घर में मृत्यु हुई है, गर्भवती महिला की या नवजात शिशु की वह कारणों को जान सकते है की एग्ज़ैक्ट्ली क्या हुआ था, कैसे ये घटनाएं घटी, क्या परिस्थितियां उत्पन्न हुई और जब वो ये सब सुनते हैं उसके बाद वो अपनी बात भी रख सकते हैं कि उनके हिसाब से क्या वस्तुस्थिति उन्होंने क्या देखा, उन्होंने क्या महसूस किया, उनके साथ क्या हुआ, इससे एक बहुत ही न्यायपूर्ण और पारदर्शी स्थिति निर्मित होती है और इसको लगातार आगे जारी रखा जायेगा। पहले कोशिश यह की जायेगी की जनवरी तक के जो पुराने केसेस हैं, उनकी समीक्षा जितना जल्दी हो सके, सितंबर-अक्टूबर में कंप्लीट कर ली जाये। उसके बाद फिर ये क्रम नियमित रूप से आगे जारी रहेगा।
