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सरकार को न्यूनतम वोट शेयर की अनिवार्यता पर विचार करने का दिया सुझाव
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह निर्विरोध उम्मीदवारों को विजेता घोषित करने से पहले न्यूनतम वोट प्रतिशत हासिल करने के प्रावधान पर विचार करे। यह टिप्पणी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपी एक्ट) की धारा 53(2) को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दी गई, जिसमें बिना मतदान के निर्विरोध जीत के प्रावधान को चुनौती दी गई है।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की डबल बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी. दातार ने तर्क दिया कि निर्विरोध चुनावों में मतदाता इनमें से कोई नहीं (नोटा) का विकल्प भी नहीं चुन सकते, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है।
दातार ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि नामांकन वापसी के चलते सिर्फ एक उम्मीदवार रह जाता है और वह अवांछनीय है, तो मतदाताओं को कोई विकल्प नहीं मिलता। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में भी मतदाता अपनी असहमति जताने के हकदार हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कांत ने टिप्पणी की, हम किसी ऐसे व्यक्ति को संसद या विधानसभा में क्यों जाने दें जो 5फीसदी वोट भी प्राप्त न कर सके? यदि कोई उम्मीदवार केवल इसलिए निर्वाचित हो जाए क्योंकि वह अकेला बचा है, तो यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसा प्रावधान बहुदलीय प्रणाली और स्वस्थ लोकतंत्र को बढ़ावा देगा, जिसमें कहा जाए कि अकेले मैदान में रह जाने वाले उम्मीदवार को भी न्यूनतम 10-15 फीसदी वैध वोट प्राप्त करने होंगे।
हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि यह संसद का क्षेत्राधिकार है और पिछले 25 वर्षों में संसद स्तर पर ऐसा केवल एक मामला सामने आया है। उन्होंने यह भी कहा कि नोटा प्रणाली का अब तक कोई प्रभावी परिणाम नहीं देखा गया है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने भी दलील दी कि अगर कोई सुधार वांछनीय है, तो न्यायालय इसकी सिफारिश कर सकता है, लेकिन किसी प्रावधान को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह कानून रद्द करने की दिशा में नहीं जा रहा, बल्कि केवल एक प्रगतिशील सुझाव दे रहा है।
अंत में, पीठ ने केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर विशेषज्ञ समिति गठित करने और जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए समय दे दिया।

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