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बोले- यूसीसी के नाम पर हिंदू कानून मुसलमानों पर लागू नहीं कर सकते
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में मुस्लिम महिलाओं के हक पर सुनवाई करते हुए कहा कि अब यूसीसी लागू करने का समय आ गया है। कोर्ट की इस टिप्पणी पर सियासी घमासान छिड़ गया है। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम पर हिंदू कानून, मुसलमानों पर लागू नहीं कर सकते हैं। ओवैसी का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि आप यूसीसी के नाम पर हिंदू कानून मुसलमानों पर लागू नहीं कर सकते हैं। निकाह हमारे के लिए धार्मिक संस्कार नहीं है, यह धर्म का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जेंडर जस्टिस करने वाले जकिया जाफरी से मुलाकात नहीं करते हैं।
ओवैसी ने एक कार्यक्रम में कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की चर्चा एक बार फिर से शुरू हो गई है। उन्होंने कहा कि यूसीसी की बात करने वालों याद रखो कि इस्लाम में शादी एक कॉन्ट्रैक्ट है। जन्म-जन्म की बात नहीं है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है कि हिंदू धर्म में अगर पत्नी ने सास-ससुर की खातिरदारी नहीं की तो यह क्रूरता है, जबकि इस्लाम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। मां-बाप की जिम्मेदारी बेटे की है। ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या हिंदू मैरिज एक्ट आदिवासियों पर लागू होगा? ओवैसी ने कहा कि अगर हिंदू धर्म में किसी शख्स को अपनी बीवी को तलाक देना है तो उसे पहले बताना होता है कि क्रूरता हुई है। 5-10 साल लगातार मुकदमा चलता है।
ओवैसी ने कहा कि भारत के एक राज्य में सीएम हैं, जिनका अपनी पत्नी के साथ 10 सालों से तलाक का मुकदमा चल रहा है। पत्नी तलाक नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि आप यूसीसी के तहत हिंदू कानून, मुसलमानों पर लागू नहीं कर सकते। मुझे अपनी धर्म के मुताबिक चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेंडर जस्टिस की बात करने वाले मुसलमान महिलाओं को आप पहले शिक्षा दीजिए, नौकरी दीजिए फिर जेंडर समानता पर बात कीजिए। जफिया जाफरी का नाम लेते हुए ओवैसी ने कहा कि जेंडर समानता की बात करने वाले जफिया जाफरी से मुलाकात नहीं करते हैं। उन बच्चों से मुलाकात नहीं करते जिन्हें दिल्ली में पुलिस ने मार दिया और अब यूसीसी की बात करते हैं, लव जिहाद की बात करते हैं।
बता दें सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा था कि यूसीसी लागू करने का समय आ गया है। अदालत ने 1937 के शरीयत कानून के कुछ प्रावधानों को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की थी। याचिका में शरीयत कानून के कुछ प्रावधानों के बारे में कहा गया है कि वह मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण है। कोर्ट ने कहा कि बेहतर होगा कि विधायिका बानी संसद ही इसका फैसला ले क्योंकि राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के मुताबिक समान नागरिक संहिता लागू करने का अधिकार विधायिका के पास है।

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