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गांधीनगर। गुजरात के निकाय चुनावों में भाजपा ने एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखते हुए विपक्ष का लगभग सूपड़ा साफ कर दिया है। शहरी क्षेत्रों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक भाजपा की लहर स्पष्ट रूप से दिखाई दी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आई। हालांकि, भाजपा की इस प्रचंड जीत के बीच आदिवासी बहुल नर्मदा जिले से आए नतीजों ने सभी को चौंका दिया है। यहाँ आम आदमी पार्टी (आप) ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए भाजपा के विजय रथ को न केवल रोका, बल्कि जिला पंचायत पर कब्जा भी कर लिया।
नर्मदा जिले की यह जीत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहीं दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी स्थित है। भाजपा जहाँ इस प्रतिमा के माध्यम से क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक बदलाव का दावा करती रही है, वहीं स्थानीय जनता ने चुनाव में अलग ही रुख दिखाया। यहाँ आप ने जिला पंचायत की 22 में से 15 सीटों पर शानदार जीत हासिल की, जबकि 2021 में भाजपा के पास 19 सीटें थीं। इसके अलावा, छह में से चार तालुका पंचायतों में भी आप का परचम लहराया है। इस जीत का मुख्य श्रेय स्थानीय आदिवासी नेता और विधायक चैतर वसावा को दिया जा रहा है। वसावा का जमीन विवाद, जंगल के अधिकार और स्थानीय प्रशासनिक मुद्दों पर जनता के साथ खड़े रहना उनके बड़े जनाधार का कारण बना है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले साल चैतर वसावा की गिरफ्तारी और जेल यात्रा ने उन्हें और अधिक मजबूती प्रदान की। सहानुभूति की लहर और उनके व्यक्तिगत प्रभाव के चलते डेडियापाड़ा विधानसभा की सभी 11 जिला पंचायत सीटों पर आप ने क्लीन स्वीप कर दिया, जहाँ भाजपा का खाता तक नहीं खुल सका। नर्मदा में भाजपा की इस हार की तुलना उत्तर प्रदेश के अयोध्या से की जा रही है, जहाँ भव्य मंदिर निर्माण के बावजूद पार्टी को चुनावी शिकस्त झेलनी पड़ी थी। आम आदमी पार्टी के लिए यह खुशखबरी ऐसे समय में आई है जब वह सूरत जैसे अपने पुराने गढ़ में कमजोर हुई है और दिल्ली में पार्टी नेतृत्व अदालती उलझनों व आंतरिक टूटफूट का सामना कर रहा है। इस जीत पर खुशी जाहिर करते हुए अरविंद केजरीवाल ने इसे बदलाव की शुरुआत बताया, वहीं चैतर वसावा ने इसे ईमानदारी और विकास की राजनीति पर जनता का विश्वास करार दिया। नर्मदा की यह जीत आने वाले समय में गुजरात की आदिवासी राजनीति में एक नए समीकरण के संकेत दे रही है।

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