मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने की याचिका दायर

नई दिल्ली। एक अहम कानूनी लड़ाई में, एक गर्भवती महिला आईपीएस अधिकारी ने प्रशिक्षण के दौरान गर्भवती होने पर रोक लगाने वाले करीब तीन दशक पुराने सरकारी नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इसतरह के फैसले पुराने नियमों के बजाय आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर होने चाहिए।
मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की आईपीएस अधिकारी उर्वशी सेंगर ने याचिका दायर की है। सेंगर ने नवंबर 2023 में अपना फेज-1 प्रशिक्षण शुरू किया था। अप्रैल 2025 में फेज-2 के दौरान जब वे गर्भवती हुईं, तब उन्हें प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ने और प्रसव के एक साल बाद अगली बैच के साथ दुबारा प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया। सितंबर 2025 में बच्चे के जन्म के बाद उन्होंने मेडिकल फिटनेस के आधार पर फेज-2 प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी ने 1993 के गृह मंत्रालय के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) का हवाला देकर उनकी मांग ठुकरा दी। यह ज्ञापन कहता है कि गर्भवती आईपीएस प्रोबेशनर को तुरंत प्रशिक्षण से रोक दिया जाएगा और वे प्रसव के एक साल बाद ही फिर प्रशिक्षण शुरू कर सकेंगी।
आईपीएस महिला अधिकारी सेंगर ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (सीएटी) का रुख किया, जिसने उन्हें अंतरिम आदेश में आवश्यक मेडिकल औपचारिकताएं पूरी करने पर प्रशिक्षण जारी रखने की अनुमति दे दी थी। हालांकि, पुलिस अकादमी ने आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने 22 जून को सीएटी के आदेश पर रोक लगा दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यह नियम महिला अधिकारी और उसके बच्चे दोनों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
दायर याचिका में कहा गया है कि 1993 का यह नियम बिना किसी भेदभाव के सभी गर्भवती अधिकारियों पर समान रूप से लागू होता है, जबकि फेज-2 प्रशिक्षण मुख्य रूप से कक्षा-आधारित और अकादमिक होता है, जो शारीरिक रूप से अत्यधिक कठिन नहीं होता। याचिका में उजागर किया गया है कि 2004 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने आईएएस महिला अधिकारियों के लिए इसी तरह के नियम में संशोधन किया था, जिससे उन्हें मेडिकल फिटनेस के आधार पर प्रशिक्षण पूरा करने की अनुमति मिली थी। सेंगर का तर्क है कि आईपीएस अधिकारियों के लिए अब भी पुराने नियम को बनाए रखना समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच अब यह तय करेगी कि क्या केवल गर्भवती होने के आधार पर किसी महिला आईपीएस अधिकारी को प्रशिक्षण से बाहर कर सकते है, या फिर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, व्यक्तिगत मेडिकल जांच और प्रशिक्षण की प्रकृति को देखकर हर मामले में अलग-अलग फैसला लिया जाना चाहिए। यह मामला देश में महिला अधिकारियों के करियर और अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।
