
पीसीपीएनडीटी एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तय की जांच की प्रक्रिया
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (पीसीपीएनडीटी) एक्ट से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रूण का लिंग पता लगाने जैसे अपराधों में पुलिस अपने स्तर पर एफआईआर दर्ज कर सीधे जांच नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए कानून के तहत अधिकृत प्राधिकारी ही मुख्य भूमिका निभाएगा।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि पीसीपीएनडीटी एक्ट से जुड़े मामलों में मेडिकल और तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है। इसलिए पुलिस को इस कानून के तहत होने वाली जांच का मुख्य अधिकारी नहीं माना जा सकता।
पुलिस सीधे अस्पताल पर नहीं मार सकती छापा
….सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत किसी अल्ट्रासाउंड सेंटर, क्लिनिक या अस्पताल में औचक निरीक्षण, छापेमारी और मेडिकल रिकॉर्ड की जांच का अधिकार अधिकृत प्राधिकारी के पास है। पुलिस अपने स्तर पर डॉक्टर या अस्पताल के खिलाफ सीधे कार्रवाई नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पडऩे पर अधिकृत प्राधिकारी पुलिस से सहायता मांग सकता है। ऐसी स्थिति में पुलिस सहयोग कर सकती है, लेकिन पीसीपीएनडीटी एक्ट के अपराध की प्राथमिक जांच और कार्रवाई अधिकृत प्राधिकारी के दायरे में रहेगी।
अधिकृत प्राधिकारी को मिले हैं व्यापक अधिकार
…….पीसीपीएनडीटी एक्ट की धारा 17(4) के तहत अधिकृत प्राधिकारी को कानून के उल्लंघन की शिकायत करने और जांच करने की शक्तियां दी गई हैं। अधिकारी अस्पताल या क्लिनिक का निरीक्षण कर सकता है और जरूरी दस्तावेज व रिकॉर्ड की जांच कर सकता है। यदि लिंग निर्धारण से जुड़े नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो अल्ट्रासाउंड मशीन, कंप्यूटर, मेडिकल रिकॉर्ड या अन्य संबंधित सामग्री को जब्त किया जा सकता है। दोष साबित होने पर संबंधित केंद्र का रजिस्ट्रेशन और डॉक्टर का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। अधिकृत प्राधिकारी आरोपी डॉक्टर या अस्पताल के खिलाफ मामला दर्ज कराने के लिए सीधे संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत कर सकता है।
मेडिकल विशेषज्ञता वाले मामलों में पुलिस की भूमिका सीमित……….
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीसीपीएनडीटी कानून चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील विषयों से संबंधित है। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड, अल्ट्रासाउंड प्रक्रिया और मेडिकल नियमों की तकनीकी समझ जरूरी होती है। इसलिए जहां तक संभव हो, इस कानून के तहत कार्रवाई में पुलिस की प्रत्यक्ष भूमिका से बचना चाहिए। कोर्ट के फैसले का असर उन मामलों पर पड़ेगा, जिनमें अल्ट्रासाउंड या अन्य तकनीक के जरिए भ्रूण का लिंग पता लगाने का आरोप लगाया जाता है।
