
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से मांगी गई जानकारी की प्रकृति और आवश्यकता पर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि किस तरह की जानकारी मांगी गई है और वह किस एफआईआर की जांच के लिए आवश्यक है।
यह मामला उपाध्याय के खिलाफ दर्ज एक रोड-रेज एफआईआर से जुड़ा है, जिसे पत्रकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने राज्य से सीधा सवाल किया कि रोड-रेज मामले में आरोपी के डिजिटल फुटप्रिंट की क्या जरूरत है? पीठ ने विशेष रूप से मांगी गई जानकारी की व्यापकता और उसका संबंधित एफआईआर की जांच से संबंध पर सवाल उठाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी निजता संबंधी चिंताओं पर जोर देकर कहा कि जांच के दौरान यदि कोई गोपनीय जानकारी रिकॉर्ड पर आती है, तब इससे व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है। पत्रकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने दलील दी कि पुलिस का नोटिस बहुत व्यापक है। उन्होंने बताया कि 18 अगस्त की कथित घटना के लिए 1 जून से डेटा और अकाउंट में लॉग-इन करने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल डिवाइस की जानकारी भी मांगी गई है। राय ने आशंका जाहिर की हैं कि इस तरह की जानकारी का इस्तेमाल पत्रकार के स्रोतों तक पहुंचने के लिए हो सकता है, और डिजिटल जानकारी तक पुलिस की पहुंच के लिए स्पष्ट दिशानिर्देशों की मांग की।
उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि याचिका मूल रूप से एफआईआर रद्द करने की मांग कर रही है और शिकायतकर्ता की चोटों से संबंधित मेडिको-लीगल केस (एमएलसी) रिपोर्ट मौजूद है, जिसके आधार पर जांच आवश्यक है। उन्होंने बताया कि पत्रकार के खिलाफ दो अन्य एफआईआर दर्ज हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने उपाध्याय को पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण दिया था।
उपाध्याय ने हाल ही में आरोप लगाया था कि यूपी पुलिस उनकी तलाश में पूर्व दिल्ली मेयर के आवास में दाखिल हुई थी। अब सुप्रीम कोर्ट गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर के जवाब का इंतजार कर रहा है ताकि इस संवेदनशील मामले में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित हो सके, और डिजिटल युग में निजता के अधिकार व पुलिस जांच की शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित हो सके।
