
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामलों में उम्रकैद की सजा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि सत्र अदालत किसी दोषी को उम्रकैद की सजा देते समय यह निर्देश नहीं दे सकती कि उसे जीवनभर जेल में रखा जाए और उसे कानूनी रूप से उपलब्ध सजा में छूट या सजा कम करने के प्रावधानों का लाभ न मिले।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि उम्रकैद का सामान्य अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष हिस्से तक कारावास है, लेकिन यह लागू कानूनी प्रावधानों के तहत मिलने वाली सजा में छूट और सजा कम करने की व्यवस्था के अधीन रहता है। सत्र अदालत इन वैधानिक शक्तियों को समाप्त नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी ऐसे मामले में की, जिसमें एक महिला और उसकी दो छोटी बेटियों की हत्या के मामले में दोषियों को सजा सुनाई गई थी। शीर्ष अदालत ने सत्र अदालत द्वारा पूरी जिंदगी बिना वैधानिक छूट के जेल में रखने की शर्त को हटाते हुए दोनों दोषियों को 25 साल के कठोर कारावास की सजा दी। दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।
अदालत ने कहा कि बिना छूट वाली विशेष श्रेणी की उम्रकैद की सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास है, सत्र अदालत के पास नहीं। इस फैसले से हत्या के मामलों में सजा तय करने और वैधानिक छूट के अधिकार को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है।
