
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि संविधान के तहत प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन के कारण रिहा किए गए किसी आरोपी को जांच एजेंसी अपनी मनमर्जी से दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। बाद में किसी भी तरह की हिरासत के लिए न्यायिक मंजूरी अनिवार्य होगी। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने जसकरण जीत सिंह देओल की अपील पर यह फैसला सुनाया। देओल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अपील की थी, जिसमें जांच एजेंसी को पॉस्को एक्ट के तहत दर्ज मामले में उनकी दोबारा गिरफ्तारी की मांग करने से रोकने से इनकार कर दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि जब किसी आरोपी को रिहा किया जाता है, जिसमें गिरफ्तारी के आधार जानने का अधिकार शामिल है तो जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी के लिए लिखित कारण प्रस्तुत करने होंगे। यदि वे हिरासत चाहती हैं, तो उन्हें संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष एक अर्जी दाखिल करनी होगी। इस अर्जी में दोबारा गिरफ्तारी के कारणों और जरुरत के साथ-साथ शुरुआती चरण में गिरफ्तारी के आधार न बता पाने की वजह भी स्पष्ट करनी होगी। बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी अनियमितता या मिलीभगत से बचने के लिए, ऐसी अर्जी को उच्च अधिकारी की तत्काल मंजूरी मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को ऐसी अर्जी पर तेजी से, संभव हो तो एक सप्ताह के अंदर फैसला लेने का निर्देश दिया, जिसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरुरी है। न्यायिक मजिस्ट्रेट दोबारा गिरफ्तारी की इजाजत तभी दे सकते हैं जब वे इस बात से संतुष्ट हों कि शुरुआती चरण में गिरफ्तारी के आधार सही वजहों से नहीं बताए जा सके थे और आरोपी को हिरासत में लेना बहुत जरुरी है।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब हिरासत की मांग वाली अर्जी मंजूरी के लिए पेश की जाए, तो उच्च अधिकारी को जांच किसी दूसरे अधिकारी को सौंप देनी चाहिए और इस गंभीर चूक की विभागीय जांच का आदेश देना चाहिए। यदि जांच में दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई प्रतिकूल बात सामने आती है, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें उनके सर्विस रिकॉर्ड में प्रविष्टि करना भी शामिल है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी की रिहाई के बाद भी जांच एजेंसी हिरासत की मांग करती है, तो वही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जो उल्लंघन के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए अपनाई जाती है। हाईकोर्ट, तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उल्लंघन के लिए पब्लिक लॉ के तहत मुआवजा देने का आदेश दे सकता है, साथ ही आरोपी को प्राइवेट सिविल लॉ के तहत कानूनी उपाय करने की इजाजत भी दे सकता है। अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और ऐसी भाषा में बताए जाने चाहिए जिसे आरोपी समझ सके, और इस नियम का उल्लंघन गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड को गैर-कानूनी बना देता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने अपीलकर्ता पर लगे आरोपों की सच्चाई या मेरिट पर कोई राय नहीं दी है। साथ ही, कोर्ट ने इस फैसले की एक प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इसका व्यापक प्रचार-प्रसार हो सके।
