
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान माना कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट-1989 के तहत सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने से पहले प्रशासनिक जांच जरूरी है। कोर्ट ने इस कड़े कानून के तहत तमिलनाडु के डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस और एक सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ चल रही कार्रवाई को रद्द कर दिया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने जननिप्रिया और एक अन्य शख्स की अपील पर सुनवाई की। बेंच ने कहा कि मामले में स्पेशल कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के प्रावधान के उलट, बिना किसी प्रशासनिक जांच के एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।
एससी/एसटी एक्ट में की गई थी कार्यवाही
कोर्ट ने कहा कि चूंकि एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के प्रावधान के तहत जरूरी प्रशासनिक जांच नहीं की गई थी, इसलिए कार्यवाही जारी रखने का कोई कारण नहीं था। अपीलकर्ताओं के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा 18ए के तहत कार्यवाही की गई थी। जानकारी दे दें कि तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में फस्र्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के आदेश के आधार पर, 18 दिसंबर 2025 को त्रिची जिले के पुथानाथम पुलिस थाने में एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 और आईपीसी की धाराओं 161ए और 167 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। साथ ही दो लोगों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी।
जांच में एसआई ने पाया था मामला झूठा
सब-इंस्पेक्टर ने शुरुआती जांच की और पाया कि यह मामला झूठा है; आरोप सिर्फ एक सिविल विवाद के बाद जवाब देने के लिए लगाए गए थे। डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस ने सब-इंस्पेक्टर की शुरुआती जांच को मंजूरी दे दी और कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इसके बाद शिकायतकर्ता क्रिमिनल प्रोसीजर कोड- 1973 की धारा 156(3) के तहत स्पेशल कोर्ट गया।
इसके बाद स्पेशल कोर्ट की ओर किया रुख
शिकायतकर्ता ने स्पेशल कोर्ट में एक और याचिका दायर की, जिसमें एससी/एसटी एक्ट की धारा 4 के तहत ड्यूटी में लापरवाही का आरोप लगाया गया। इस पर स्पेशल कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां हाई कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया, इसके बाद अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
