
एससी-एसटी एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती वाली याचिका खारिज
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की कई धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है और इसकी कुछ धाराएं संविधान में दिए गए समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। याचिका में विशेष रूप से धारा 18-ए को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की जरूरत नहीं होती।
वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में दलील दी कि ऐसे मामलों में सजा की दर कम है और गलत मामलों में भी करोड़ों रुपये का मुआवजा दिया जा रहा है। उन्होंने अग्रिम जमानत और गिरफ्तारी से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2020 में तीन न्यायाधीशों की पीठ इस कानून के प्रावधानों को बरकरार रख चुकी है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि किसी एक मामले या कथित दुरुपयोग के आधार पर कुछ ही वर्षों में कानून की दोबारा समीक्षा नहीं की जा सकती। वहीं मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अगर किसी प्रावधान का दुरुपयोग होता है तो अदालत अपने न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल कर ऐसे मामलों से निपट सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा कानून गलत है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनने पर एफआईआर रद्द की जा सकती है और केवल एससी-एसटी एक्ट का उल्लेख होने से हर स्थिति में अग्रिम जमानत पर रोक नहीं लगती।
