
नई दिल्ली। दिल्ली में 10 अक्टूबर 2026 को हुए सीजेपी प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई और लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरों ने 1975 की इमरजेंसी के दौर की यादें ताजा कर दी हैं। उस समय प्रेस सेंसरशिप से लेकर विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी तक कई बड़े कदम उठाए गए थे। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्या मौजूदा स्थिति वाकई उस दौर से मिलती-जुलती है या दोनों में बुनियादी अंतर हैं। 25 जून 1975 को लागू हुई इमरजेंसी, जो 21 मार्च 1977 तक चली, एक ऐसा दौर था जब देश ने कड़े प्रतिबंधों का सामना किया।
इस दौरान अखबारों में प्रकाशित होने वाली खबरों पर कड़ी सेंसरशिप लगाई गई, जिससे सरकार की आलोचना करने वाली सामग्री का प्रकाशन रुक गया। विपक्षी नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और कुछ पत्रकारों को बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया गया। विरोध-प्रदर्शनों और अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर सख्ती से रोक लगा दी गई थी। नागरिकों के कई मौलिक अधिकारों के न्यायिक संरक्षण पर भी पाबंदी लग गई थी, जिससे सरकारी कार्रवाई को अदालतों में चुनौती देना बेहद मुश्किल हो गया था। हाल ही में, 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आईं। इस प्रदर्शन को लेकर पुलिस की अनुमति, सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों पर चर्चा हुई। कुछ क्षेत्रों में यातायात और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों के साथ-साथ मोबाइल इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद किए जाने की भी खबरें आई थीं। दोनों स्थितियों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। 1975 में पूरे देश में संवैधानिक प्रावधानों के तहत इमरजेंसी लागू थी, जो राष्ट्रव्यापी थी। वहीं, सीजेपी प्रदर्शन के दौरान रिपोर्ट की गई पाबंदियां एक विशिष्ट विरोध प्रदर्शन और संबंधित कानून-व्यवस्था की स्थिति से जुड़ी हुई थीं, न कि पूरे देश पर लागू होने वाली संवैधानिक इमरजेंसी। इसलिए, दोनों घटनाओं को एक जैसा मानना सही नहीं है। हालांकि, विपक्षी पार्टियों और कॉकरोच जनता पार्टी ने इन पाबंदियों को अघोषित इमरजेंसी करार दिया है, जिससे यह बहस और भी तेज हो गई है।
