भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

नई दिल्ली। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई लोक सेवक रिश्वत मांगते हुए पकड़ा जाता है, तो उसे बड़े अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेने का सुरक्षा कवच नहीं मिलेगा। कोर्ट ने कहा कि यह कानूनी सुरक्षा केवल इसलिए दी गई है, ताकि अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए लिए गए फैसलों के लिए बेवजह परेशान न किए जाएं।
यह फैसला जस्टिस एसवीएन भट्टी और एनवी अंजारिया की पीठ ने किया। नियम के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों से बिना आधिकारिक मंजूरी के पूछताछ या जांच नहीं की जा सकती। राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी, जिसमें उस पर 1.5 लाख रुपए की रिश्वत मांगने का आरोप है। इस अपील को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि सुरक्षा कवच, आपराधिक मामलों का सामना कर रहे सभी लोक सेवकों पर एक साथ या बिना किसी भेदभाव के लागू नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान की अतिरिक्त महाधिवक्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए, पीठ ने कहा कि रिश्वत की मांग करना पूरी तरह से एक आपराधिक कृत्य है। इसका आधिकारिक कार्यों से कोई लेना-देना नहीं है और न ही इसका लोक सेवक के रूप में अपीलकर्ता द्वारा दी गई किसी सिफारिश या लिए गए किसी फैसले से कोई संबंध है। फैसला लिखते हुए जस्टिस अंजारिया ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, अपीलकर्ता का कृत्य इस अधिनियम के तहत मिलने वाले संरक्षण के दायरे में नहीं आता है। यह नहीं कहा जा सकता कि मंजूरी न होने के कारण पूरी कार्यवाही दूषित हो गई थी।
