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अभियोजन पक्ष अपराध प्रमाणित करने में रहा असफल रहा

इन्दौर । अपर सत्र न्यायाधीश अरुण शर्मा की कोर्ट ने 33 साल पुराने फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाकर टेलीफोन आपरेटर की सरकारी नौकरी पाने वाले पूर्व जनपद अध्यक्ष, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं में बरी कर दिया। आरोप तय होने के 11 वर्ष बाद तक भी पुलिस कोर्ट ट्रायल में यह प्रमाणित नहीं कर पाई कि नेता जी ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाकर धोखाधड़ी की है। 33 साल पुराने इस मामले में कोर्ट ने निर्णय में यह टिप्पणी की कि …अभियोजन पक्ष अभियुक्त के विरुद्ध अपराध प्रमाणित करने में असफल रहा है। अतः अभियुक्त को धारा 420, 467, 471 के आरोप से दोषमुक्त किया जाता है।
प्रकरण कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि अभियुक्त रामसिंह पारिया ने 21 सितम्बर 1978 को संभागीय अभियंता डी.एम.टी. इंदौर के समक्ष टेलीफोन ऑपरेटर के पद पर नियुक्ति हेतु आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था जिसमें उसने स्वयं को आदिवासी (भिलाला) जाति का होना बताया था। उसे 14 जुलाई 1980 से इस पद पर नियुक्ति दी गई। करीब 10 वर्ष बाद 31 जनवरी 1990 को रामसिंह ने उक्त पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दिया था। इसके करीब छह माह बाद एक जून 1990 को कलेक्टर इंदौर को इस आशय की शिकायत मिली कि रामसिंह पारिया सामान्य जाति का होकर ठाकुर है और उसने धोखाधड़ी से स्वयं को अनुसूचित जाति का बताकर नौकरी प्राप्त की थी। कलेक्टर के आदेश पर तत्कालीन नायब तहसीलदार ने मामले की जांच की। जांच में शिकायत सही पाने पर 17 जून 1991 को एफआईआर दर्ज कराई गई और वर्ष 1993 में कोर्ट में चालान पेश किया गया। प्रकरण में अभियोजन द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत 17 गवाहों की सूची में से छह गवाहों की मृत्यु हो गई और अन्य छह गवाहों पर तामीली की कोई संभावना नहीं होने से उन्हें अदम (अज्ञात) घोषित किया गया। इसके अलावा अन्य दो गवाहों को अभियोजन ने छोड़ दिया मात्र तीन गवाहों का ही कोर्ट में परीक्षण कराया जा सका। जिसमें निर्णय सुनाते जिला कोर्ट ने अभियुक्त रामसिंह पारिया पूर्व जनपद अध्यक्ष तथा वरिष्ठ कांग्रेसी नेता निवासी बड़ी ग्वालटोली को धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं से बरी कर दिया।

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