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क्रिश्चियनों के लिए बने कब्रिस्तान में शव दफनाने का आदेश
नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक धर्म परिवर्तन कर क्रिश्चियन बने शख्स को दफनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने अपना फैसला सुना दिया है। दोनों जज ने इस मामले में अलग-अलग राय रखी। मृत शख्स के बेटे ने गांव में ही पिता के शव को दफनाने की मांग कर याचिका दायर की थी। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शव को मृतक की निजी जमीन पर दफनाने के आदेश दिए, मगर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा इस बात से सहमत नहीं हुए। कोर्ट ने केस को बड़ी खंडपीठ में भेजने से इंकार कर दिया, क्योंकि शव पिछले तीन हफ्ते से मोर्चुरी में पड़ा है। खंडपीठ ने प्रशासन को शव को गांव से 20 किलोमीटर दूर क्रिश्चियनों के लिए बने कब्रिस्तान में शव को दफनाने की व्यवस्था करने का आदेश दिया है।
करीब तीन हफ्ते पहले सुभाष बघेल की मौत हो गई थी। उनके बेटे रमेश ने अपने पिता के शव को पैतृक जमीन में दफनाने का प्रयास किया, इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया। फिर ये मामला कोर्ट में पहुंच गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी शव को ईसाइयों के लिए बने कब्रिस्तान में दफनाने का निर्णय दिया। इस पर बेटे रमेश बघेल ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती दी थी। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि कोर्ट इस बात से दुख हो रहा है कि एक व्यक्ति को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा।
बघेल के वकील कॉलिन गोंजाल्विस ने तर्क दिया था कि परिवार के सदस्यों को धर्म परिवर्तन के बाद भी गांव के कब्रिस्तान में दफनाया गया। रमेश ने कहा कि मैं गांव से बाहर नहीं जाना चाहता। मैं नहीं चाहता कि मेरे साथ सिर्फ इसलिए अछूत जैसा व्यवहार हो, क्योंकि मैंने धर्म परिवर्तन किया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध कर कहा कि यह आदिवासी हिंदुओं और आदिवासी ईसाइयों के बीच अशांति पैदा कर सकता है। उन्होंने बताया कि गांव से सिर्फ 20 किलोमीटर दूर एक ईसाई कब्रिस्तान है, जहां शव को दफना सकते है। गांव की जमीन पर एक हिंदू आदिवासी कब्रिस्तान है।
जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि इस केस में दो फैसले हुए हैं। उन्होंने कहा कि माना जाता है कि मौत के बाद सब एक हो जाते हैं और हमें खुद को यह याद दिलाने की जरूरत है। इस मौत ने दफनाने के अधिकार को लेकर ग्रामीणों के बीच विभाजन पैदा कर दिया है। अपीलकर्ता का कहना है कि भेदभाव और पूर्वाग्रह है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने हाई कोर्ट के सुझाव को स्वीकार कर लिया कि यह गांव की प्रथाओं से अलग है। उन्होंने कहा कि इस मामले में ग्राम पंचायत के रवैये से भेदभाव को बढ़ावा मिला। उन्होंने पुलिस के हलफनामे का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले व्यक्ति को गांव की जमीन पर दफनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि आधारभूत बात यह है कि दफनाने से जुड़ी धार्मिक परंपरा मौलिक अधिकारों को अन्य धर्म के लिए निर्धारित स्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए या नहीं। उन्होंने कहा कि ईसाइयों का कब्रिस्तान करकवाल में है, जो मात्र 20 किलोमीटर दूर है। न्यायमूर्ति ने कहा कि दफनाने का बिना शर्त अधिकार होना चाहिए। व्यापक और भ्रामक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित कर सकते हैं। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना समाज के व्यापक हित में है। उन्होंने कहा कि राज्य प्रशासन को गांव से 20 किलोमीटर दूर मैदान में दफनाने के लिए परिवहन और सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।

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