नई दिल्ली । स्वीडन के स्कूलों में किताबों की जगह कंप्यूटर लगाने की शुरुआत 2009 में कर दी गई थी। सभी स्कूलों पर कंप्यूटर लगाए गए थे।पाठ्य पुस्तकों की विदाई हो गई थी।
15 साल बाद अब स्वीडन सरकार को वास्तविकता का ज्ञान हुआ। 104 मिलियन यूरो, भारतीय मुद्रा में 940 करोड रुपए खर्च करके अब कंप्यूटर हटाकर पाठ्य पुस्तकें स्कूल में शुरू की जा रही हैं। डिजिटल लर्निंग का असर बच्चों की पढ़ाई और ज्ञान पर पड़ा है। उसके दुष्प्रभाव का अध्ययन करने के बाद एक बार फिर स्वीडन में पाठ्य पुस्तक से स्कूलों में पढ़ाई शुरू की जा रही है।
डिजिटल पढ़ाई के कारण छात्रों में पढ़ने और लिखने के कौशल में भारी कमी देखने को मिली। कई शोध के बाद यह जानकारी मिली, स्क्रीन से पढ़ाई करने पर आंखों पर अधिक जोर आ रहा है। बहुत कम उम्र में छात्रों को चश्मा पहनना पड़ रहे हैं। छात्रों का ध्यान पढ़ाई में केंद्रित नहीं होता है। डिजिटल पढ़ाई के बाद समझने और याद रखने की क्षमता पहले की तुलना में छात्रों की बहुत कम हो गई है।छात्र अब किसी भी विषय पर एकाग्रचित नहीं हो पाते हैं। बार-बार ध्यान भटकने से इसका असर छात्रों में देखने को मिल रहा है।
पढ़ाई के दौरान छात्र इंटरनेट सर्फिंग और गेम इत्यादि खेलने में उनका ध्यान होता है। जिसके कारण पढ़ाई के दौरान छात्रों का मन भटकता रहता है। 2022 के बाद से डिजिटल पढ़ाई के स्थान पर पुरानी व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार प्रयासरत थी। स्वीडन सरकार का उद्देश्य शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाकर रखना है। इसके लिए स्कूल से कंप्यूटर और डिजिटल उपकरण हटाकर,एक बार फिर पाठ्य पुस्तकों का सहारा लिया है। इसके लिए स्वीडन की सरकार भारतीय मुद्रा में 940 करोड रुपए खर्च कर रही है।
