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कोर्ट ने पत्रकार पर 25000/- रूपए कास्ट लगाते माना कि याचिका निहित स्वार्थ हेतु लगाई गई है

वादी सरकारी भूमि पर धार्मिक स्थलों के अवैध निर्माण से इतना ही व्यथित है, तो उसे सरकारी भूमि पर या बिना अनुमति के निर्मित सभी धार्मिक संरचनाओं को चुनौती देनी चाहिए – अदालत
इन्दौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की युगल बेंच ने एक पत्रकार द्वारा मंदिर को हटाने की याचिका गंभीर टिप्पणी के साथ खारिज करते याचिकाकर्ता पत्रकार पर रूपये 25000 की कास्ट भी लगाई है। बता दें कि इससे पहले उक्त पत्रकार द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता पत्रकार को जनहित याचिका दायर करने के योग्य नहीं मानते याचिका खारिज कर यह कहा था कि याचिकाकर्ता जनहित याचिका दायर करने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता नहीं है। अब वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता रिकॉर्ड के आधार पर न्यायालय को मंदिर की स्थिति को लेकर कोई त्रुटि नहीं बता पाया जिसके चलते न्यायालय ने मामले का निर्णय गुण-दोष के आधार पर करते खुद को पत्रकार बताने वाले याचिकाकर्ता पर 25000 रुपये का जुर्माना लगाते हुए कहा कि आवेदक का परिसर में निहित स्वार्थ है जिसके चलते उसने ऐसी याचिका दायर की है। पीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के पास मंदिर को हटाने की मांग करने का कोई विशेष कारण नहीं था। ज्ञात हो कि पत्रकार द्वारा यह याचिका इंदौर के यशवंत निवास रोड पर स्थित एक मंदिर को हटाने की मांग करते दायर की गई थी जिसमें सूचीबद्ध 25 प्रतिवादियों में से 20 मनमोहन पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर एवं गुरु मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष और ट्रस्टी हैं। सुनवाई पश्चात न्यायालय ने गंभीर प्रश्नात्मक टिप्पणी करते कहा कि, याचिकाकर्ता यशवंत निवास के आस-पास के इलाकों का निवासी नहीं है। उसने यह नहीं बताया है कि वह जनहित में यशवंत निवास रोड पर स्थित एक मंदिर को ही क्यों निशाना बना रहा है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि एक पत्रकार होने के नाते उसे यह जनहित याचिका दायर करने से पहले इंदौर या मध्य प्रदेश में सभी अवैध निर्माणों के बारे में सर्वेक्षण कर लेना चाहिए था। इसलिए, ऐसी याचिका को जनहित याचिका नहीं माना जा सकता, जब याचिकाकर्ता की दिलचस्पी केवल एक मंदिर में है। ऐसा लगता है कि उसका इसमें कोई निहित स्वार्थ है। हमें समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करने के लिए खंडपीठ द्वारा पारित आदेश में रिकॉर्ड के आधार पर कोई गलती नहीं दिखती इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि वादी सरकारी भूमि पर धार्मिक स्थलों के अवैध निर्माण से इतना ही व्यथित है, तो उसे सरकारी भूमि पर या बिना अनुमति के निर्मित सभी धार्मिक संरचनाओं को चुनौती देनी चाहिए।

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