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राज्य सरकार लोक सेवा आयोग व अन्य को नोटिस
जबलपुर। रादुवि के कुलगुरू डॉ राजेश वर्मा की प्रोफेसर के रूप में मूल नियुक्ति और कुलगुरू के पद पर नियुक्ति को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मामले पर शनिवार को प्रारंभिक सुनवाई के बाद जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि इस याचिका में विशुद्ध कानूनी मुद्दा उठाया गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार, मप्र लोक सेवा आयोग, उच्च शिक्षा विभाग और रादुविवि के कुलगुरू को को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन जबलपुर के जिला अध्यक्ष सचिन रजक और अभिषेक तिवारी ने याचिका दायर कर आरोप लगाया कि डॉ वर्मा की नियम विरुद्ध तरीके से प्रोफेसर के पद नियुक्ति हुई थी। यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार प्राफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए पीएचडी डिग्री मिलने के बाद 10 साल अध्यापन का अनुभव जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता उत्कर्ष अग्रवाल ने दलील दी कि डॉ. वर्मा को पीएचडी 25 नवंबर 2008 को प्रदान की गई थी। इसके बाद 19 जनवरी 2009 को एमपीपीएससी ने प्राध्यापक पद पर नियुक्ति का विज्ञापन जारी किया था। इस पद के लिए पीएचडी डिग्री मिलने के बाद 10 साल पढ़ाने का अनुभव जरूरी था। आवेदन करने वालों के पास यह अनुभव विज्ञापन की अंतिम तारीख, यानी 20 फरवरी 2009 तक होनी चाहिए थी। कुलगुरु की प्रथम नियुक्ति जो कि प्रोफेसर के पद पर हुई है, वह नियम के खिलाफ है। दलील दी गई कि पूर्व में संगीता बारूकर के केस में एमपीपीएससी ने शपथ पत्र में कहा था कि प्रोफेसर में नियुक्ति के लिए पीएचडी के बाद कम से कम 10 साल टीचिंग का अनुभव होना चाहिए, जो कि डॉक्टर राजेश वर्मा के केस में नहीं है। तर्क दिया गया कि जब मूल नियुक्ति नियम विरुद्ध है तो कुलगुरू के पद पर नियुक्ति वैधानिक कैसे मानी जा सकती है।

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