
मुंबई । क्या दुर्घटना मामले में पीड़ित अपनी मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत मुआवजा लेने के बाद वारदात में शामिल दूसरे पक्ष की इंश्योरेंस कंपनी से भी मुआवजा लेने का हक रखता है। यह मामला पिछले एक दशक में कई अलग-अलग कोर्ट के सामने आया। अब बॉम्बे हाईकोर्ट की तीन जजों की बैंच ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, इससे इंश्यारेंस कंपनियों को मोटा नुकसान होता तय है। दरअसल बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्ण बेंच ने फैसला सुनाया है कि मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत एक्सिडेंट पीड़ित को दी गई राशि को मोटर वाहन अधिनियम के तहत ‘चिकित्सा खर्च’ के लिए दिए गए मुआवजे से नहीं काटा जा सकता।
हाईकोर्ट के सामने यह केस न्यू इंडिया एश्योरेंस की ओर से दायर किया गया था। न्यायमूर्ति एएस चंदुर्कर, मिलिंद जाधव और गौरी गोडसे की पूर्ण बेंच के सामने एमएसीटी कोर्ट द्वारा चिकित्सा खर्चों के लिए प्रदान किए गए मुआवजे को चुनौती दी थी। इसमें बताया गया कि दावेदार को पहले से ही अपनी निजी मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत चिकिस्ता खर्च मिल चुका है। इसके बाद अब उनपर इस इलाज का खर्च नहीं नहीं डाला जाना चाहिए। साल 2013 में, हाईकोर्ट का यह मानना था कि मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत प्राप्त राशि को चिकित्सा खर्चों के लिए दिए जाने वाले मुआवजे की राशि से काटा जा सकता है। हालांकि साल 2006 और 2019 में अन्य बेंचों ने इसी तरह के मामलों में अलग रुख दिखाया था।
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दावेदार द्वारा सहन किए गए नुकसान का दावा केवल एक बार हो सकता है, न कि कई बार हो सकता। दोनों को अनुमति देना “दावेदार के लिए अप्रत्याशित लाभ या ऐसी स्थिति में दोहरा मुआवजा” होगा। ऐसी पॉलिसी के तहत पक्षों के अधिकार अनुबंधीय शर्तों द्वारा शासित होते हैं। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 168 के तहत, दावेदार “उचित मुआवजे” के हकदार हैं जो कि दोषी वाहन के बीमाकर्ता द्वारा दिया जाना है। यह दायित्व कानूनी है और “अनिवार्य थर्ड पार्टी इंश्योरेंस पॉलिसी” की अवधारणा से उत्पन्न होता है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 2019 के निर्णय से सहमति व्यक्त की, जिसमें कहा गया था कि बीमाकर्ता को दोनों बार भुगतान करना होगा। जो पीड़ित अपने मेडिक्लेम पॉलिसी से प्राप्त करता है, वह प्रीमियम के भुगतान का प्रतिफल होता है। यह वह कड़ी मेहनत की कमाई है जो वह प्रीमियम की ओर लगाता है, जो कि दुर्घटना के बाद उसे वापस कर दी जाती है।
