पूरे दिन की आपाधापी के बाद,
जब साँझ ढल जाने के बाद,
अपने कमरे से निकल बालकनी में कुछ पल अपनी सोहबत में जब अकेली बैठती हूँ,
तो आँखों से बतिया लेती हूँ चाँद से,
वो भी चुपचाप बतिया लेता है फुर्सत से।
कभी किसी दिन मंदिर की
पावन घंटियों को सुन कर,
सुना देती हूँ, धीमे आरोह और अवरोह
के साथ मीठी सी ईश आरती,
जिसे सुनकर पेड़ों की सरसराहट
अपने साज की संगत दे देती है,
मुझे कभी दुबकी सी चिड़िया तो
कभी झल्लाये से कबूतर अपने
पंखों को फड़फड़ाकर निहार
लेते हैं, और मैं उन्हें कह देती हूँ,
पूरे दिन उड़ उड़ कर थक गए होंगे,
अब ढली साँझ विश्राम कर लो,
और वो भी मुझे कह कह कर
थक जाते हैं कि मैं भी जूझ
कर थक गई होंगी,
पर मैं मौन सी विश्राम के लिए नहीं जाती,
कभी सोई सी कोयल जाने क्यों
तीव्र स्वरों में कूक उठती है और
मैं उसके मधुर स्वरों को अपने
भीतर आत्मा तक उतार लेती हूँ।
जब इन सभी की सोहबत से
निहाल हो, थकन से मेरी आँखें
नींद के आगोश में बुला रही होती
हैं, तो फिर मैं नए दिन के
जागरण के लिए खुद को
ऊर्जस्वित करने के लिए निद्रा
देवी की शरण में चली जाती हूँ,
अगले दिवस की सक्रियता को
संचित करने के लिए…
–डॉ. सारिका शर्मा
-नई दिल्ली
