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नई दिल्ली। दिल्ली सरकार की एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने राउस एवेन्यू कोर्ट के एक स्पेशल जज और उनके कोर्ट स्टाफ (अहलमद) पर रिश्वत के गंभीर आरोप लगाए हैं। एसीबी ने 29 जनवरी 2025 को विधि विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर जांच की अनुमति मांगी थी, जिसमें दावा किया गया था कि जज और स्टाफ ने जमानत दिलाने के बदले करोड़ों रुपये की रिश्वत मांगी थी। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 फरवरी को पर्याप्त सबूतों की कमी का हवाला देते हुए जज के खिलाफ जांच की अनुमति देने से इनकार कर दिया, लेकिन एसीबी को जांच जारी रखने की छूट भी दे दी। इसके बाद, 16 मई को कोर्ट स्टाफ के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई और 20 मई को संबंधित स्पेशल जज का ट्रांसफर कर दिया गया।
रिश्वत मांगने के गंभीर आरोप
जानकारी अनुसार एसीबी को पहली शिकायत 30 दिसंबर 2024 को मिली थी, जिसमें एक जीएसटी अधिकारी के रिश्तेदार ने आरोप लगाया कि आरोपियों की जमानत के एवज में 85 लाख से एक-एक करोड़ रुपये तक की रिश्वत मांगी गई। शिकायत में यह भी कहा गया कि रिश्वत देने से इनकार करने पर जमानत याचिकाओं को जानबूझकर लंबित रखा गया और फिर खारिज कर दिया गया। 20 जनवरी को मिली एक अन्य शिकायत में एक व्यक्ति ने बताया कि कोर्ट के अहलमद ने उनसे सीधे संपर्क कर प्रति व्यक्ति 15-20 लाख रुपये की मांग की थी।
ऑडियो रिकॉर्डिंग और प्राथमिक जांच में पुष्ट आरोप
एसीबी ने अपनी जांच में पाया कि शिकायतें घटनाक्रम और प्राप्त ऑडियो रिकॉर्डिंग से मेल खाती हैं, जिससे आरोपों की गंभीरता और प्रामाणिकता और भी पुख्ता हो गई। एफआईआर दर्ज होने के बाद कोर्ट स्टाफ (अहलमद) ने अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई। 22 मई को कोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है और एक पर्ची जैसे दस्तावेज भी मामले में उसकी भूमिका को स्पष्ट करते हैं।
न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल
यह मामला न्यायपालिका की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। हालांकि हाईकोर्ट ने सीधे जज पर कार्रवाई से इनकार किया है, लेकिन ट्रांसफर और जांच जारी रखने का आदेश यह दर्शाता है कि मामले की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया गया है।

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