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गुरु-शिष्य की आभा से दैदीप्यमान हुआ पथरिया

पथरिया ! विराग नगरी पथरिया आज फिर उसी दिव्य आलोक से आलोकित हुई, जिसे कभी आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महामुनिराज ने अपनी साधना और सान्निध्य से सजाया था। पर आज दृश्य कुछ अलग था, आज उनके ही परम प्रभावक, परम शिष्य, और पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी मुनिराज के मंगलमय पदार्पण ने नगर को उसी गुरु-विरागमयी भाव में डुबो दिया।
यह कोई साधारण आगवानी नहीं थी। यह तो गुरु की परंपरा का पुनर्जन्म थी। नगरवासियों की आंखों में भावुकता थी, हृदयों में उल्लास, और वातावरण में गुरुकृपा की तरंगें गूंज रही थीं। ऐसा प्रतीत हुआ मानो आचार्य श्री विराग सागर जी स्वयं अपने ही शिष्य के रूप में फिर पथरिया की भूमि पर पधारे हों।

गुरु की मिट्टी में खिला शिष्यत्व का कमल
आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज, जिन्होंने पथरिया को अपना साधना क्षेत्र बनाया, समाधिस्थ होने के बाद भी विरागोदय तीर्थ के माध्यम से आज भी जीवित हैं।
उनका हर स्वप्न, हर विचार, हर कल्पना आज विरागोदय के स्वरूप में मूर्त हो चुका है। और अब, उनके हाथों से दीक्षित, तपस्वी परंपरा के श्रेष्ठ वाहक, पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी मुनिराज के पदार्पण से पथरिया को फिर वही गौरव प्राप्त हुआ, जिसकी छाया में नगर एक बार फिर वैराग्य, समता और संयम की सुगंध से भर उठा। इस पावन यात्रा में श्री मुनिराज 25 पिच्छी धारी साधु-संतों के साथ पधारे। उनका यह नगर प्रवेश मात्र एक औपचारिक आगमन नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा की पुनःस्थापना का क्षण था।
सड़कों पर पुष्पवर्षा, वंदन द्वार, जयकारों से गूंजते गलियारे और श्रद्धालुजनों की आंखों में नमी यह सब प्रमाण था कि आज भी सच्चे गुरु की पहचान और स्मृति हृदयों में जीवित है।

परिचय:
श्री 108 विशुद्ध सागर जी मुनिराज संयम के साक्षात स्वरूप
पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी, आचार्य श्री विराग सागर जी के सर्वाधिक निकटस्थ और योग्य शिष्य माने जाते हैं।
उनका जीवन संयम, साधना और स्वावलंबन की मिसाल है।
उन्होंने अल्पवय में गृहस्थ जीवन का परित्याग कर दिगंबर जैन परंपरा में दीक्षा ली और अनेक वर्षों तक कठोर तपश्चर्या कर साधना की ऊंचाइयों को छुआ। आप जैन समाज के युवाओं और साधकों के लिए प्रेरणा का जीवंत स्रोत हैं।

विरागोदय का शिखर स्पर्श
आज आचार्य श्री के स्वप्न और तप से निर्मित विरागोदय तीर्थ अपनी अंतिम ऊँचाई को छू रहा है। यह तीर्थ न केवल वास्तु रूप से भव्य है, बल्कि विचार और साधना के स्तर पर भी एक अनुपम आदर्श है। विशुद्ध सागर जी मुनिराज का यहाँ पदार्पण, इस तीर्थ को चेतन-शक्ति से भर रहा है।
यह तीर्थ, केवल इमारत नहीं, बल्कि आचार्य गुरुवर की जीवंत गाथा है। जहां पत्थरों में तपस्या है, और हवा में आत्मकल्याण की महक।


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