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दमोह। सिख धर्म की स्थापना करने वाले गुरु नानक जी निर्गुण उपासना में विश्वास करते थे और सर्वधर्म सद्भावना के समर्थक थे। इंदरजीत सिंह अरोरा ने बताया की गुरु नानक देव जी अपने जीवन के अंतिम 18 वर्षों तक करतारपुर में रहे। उन्होंने रावी नदी के तट पर करतारपुर बसाया था। वहां उन्होंने खेती की और लंगर आरंभ कराया। यहां खेती कर उन्होंने श्नाम जपो, किरत करो और वंड छको (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का सबक दिया था। इतिहास के अनुसार 1539 में गुरू नानक देव जी की ज्योति – जोत में मिल गई। जिस स्थान पर उन्होंने शरीर त्यागा, वहां पर श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा बना है।
हिंदु और मुस्लिम दोनों ही उनके अनुयायी थे। जब गुरु नानक जी ने शरीर छोड़ा तो उनके अंतिम संस्कार को लेकर विवाद हुआ। जब दोनों ही पक्ष उनका शरीर लेने पहुंचे तो वहां चादर के नीचे केवल फूल ही मिले। गुरु नानक देव जी नहीं चाहते थे कि जिस धार्मिक एकता का वो जीवन पर्यंन्त पोषण करते आए, वो उनकी मृत्यु पर खत्म हो जाए, इसलिए उनकी अस्थियां फूलों में तब्दील हो गई।इन फूलों का हिंदू और मुस्लिम अनुयायियों ने अपने अपने तरीके से अंतिम संस्कार किया। करतारपुर साहिब वो जगह है जहां हिंदू समुदाय ने चादर का संस्कार किया व मुसलिम समुदाय ने गुरु नानक देव जी की चादर और फूलों को का अंतिम संस्कार किया था। गुरुनानक देव जी का संदेश एक पिता एकस के हम बेरिक, ये उपदेश हमें शिक्षा देता है कि दुनिया में सभी इंसान एक समान हैं, एक ही पिता की संतान हैं, आज गुरु साहिबान की शिक्षा को आत्मसात करके अपना, समाज और राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की जरूरत है।
इस अवसर पर आज गुरुद्वारा में अखंड पाठ साहिब की समाप्ति उपरान्त रागी जत्था भाई जसपाल सिंह जी वारा शबद कीर्तन गुरबानी से संगत को निहाल किया। समाप्ति उपरांत गुरु का अटूट लंगर सभी धर्म प्रेमियों के लिये वरताया गया। इसमें दमोह की समूह संगत का भरपूर सहयोग रहा। गुरद्वारा गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष बलबीर सिंह सलूजा अतः सचिव अमरजीत सिंह छाबड़ा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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