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यह व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह प्रमोशन चाहता है या नहीं
चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने पदोन्नति को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि कोई कर्मचारी या सिपाही पदोन्नति नहीं चाहता, तो विभाग या डीजीपी भी उसे जबरन प्रमोशन देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि यह पूरी तरह कर्मचारी की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह पदोन्नति चाहता है या नहीं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक आदेश मात्र से किसी पर दबाव डालकर पदोन्नति स्वीकार करने को मजबूर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि सिपाही या कोई भी सरकारी कर्मचारी पदोन्नति प्रक्रिया से इनकार कर सकता है और यह उसका अधिकार है। सुनवाई में कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रमोशन कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह सम्मान और अवसर है, जिसे योग्यता और नियमों के मुताबिक दिया जाता है। इसलिए कर्मचारी को इसका दावा करने का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि कोई कर्मचारी प्रमोशन लेने से मना करता है, तो उसे भविष्य में इसके लाभ से वंचित रहना होगा।
फैसले में कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि आपराधिक मामले में बरी हो जाना सेवा में बहाली का स्वतः आधार नहीं हो सकता यानी यदि कोई कर्मचारी किसी अपराध से बरी हो जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे अनिवार्य रूप से सेवा में बहाल कर दिया जाए। हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी विभागों और कर्मचारियों दोनों के लिए अहम माना जा रहा है। इससे साफ हो गया है कि प्रमोशन के मामले में व्यक्ति की इच्छा को सर्वोपरि माना जाएगा और प्रशासनिक दबाव से किसी पर फैसला नहीं थोपा जा सकता।

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