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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ नारे पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। हाई कोर्ट ने न केवल इस नारे को असंवैधानिक बताया, बल्कि विभिन्न धर्मों के जयघोषों (जैसे जय श्रीराम) के मूल उद्देश्य और उनके दुरुपयोग के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने स्पष्ट किया कि यह नारा भारतीय न्याय प्रणाली और संविधान के लिए एक सीधी चुनौती है। यह नारा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत अपराध है, क्योंकि यह देश की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालता है। कोर्ट ने माना कि इसतरह के नारे लोगों को कानून हाथ में लेने और सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाते हैं। अदालत ने कहा कि कुरान या किसी भी प्रामाणिक इस्लामी ग्रंथ में इस नारे का कोई उल्लेख नहीं है। यह नारा पाकिस्तान से फैला है और पैगंबर मोहम्मद के क्षमाशील आदर्शों के विपरीत है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर धर्म के नारों का एक पवित्र उद्देश्य होता है, जिस हिंसा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जय श्रीराम’, ‘हर-हर महादेव’, ‘सत श्री अकाल’ और ‘अल्लाहु अकबर’ जैसे उद्घोष मूल रूप से ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए हैं। अदालत ने कहा कि जब इन नारों का इस्तेमाल किसी को डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के लिए किया जाता है, तभी ये अपराध की श्रेणी में आते हैं।
मामला क्या था?
दरअसल यह टिप्पणी बरेली में सितंबर में हुई हिंसा के आरोपी रिहान की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। आरोपी पर अवैध भीड़ का हिस्सा होने, आपत्तिजनक नारे लगाने और पुलिसकर्मियों को घायल करने का आरोप था। कोर्ट ने केस डायरी के साक्ष्यों को देखते हुए आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि भारत में सजा देने का अधिकार केवल कानून और संविधान को है। किसी भी धार्मिक नारे का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती देने या समाज में डर पैदा करने के लिए नहीं किया जा सकता।

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