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जबलपुर। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने नर्मदा नदी में प्रतिदिन 98 करोड़ लीटर अनुपचारित सीवेज का पानी बहाने के मामले को गंभीरता से लिया है। जनहित याचिका प्रारंभिक सुनवाई के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के प्रमुख सचिव, नगरीय विकास सचिव, नगर निगम जबलपुर, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण को नोटिस जारी कर जवाब-तलब कर लिया गया। साथ ही इस जनहित याचिका की पूर्व से विचाराधीन जनहित याचिका के साथ सुनवाई की व्यवस्था दी।
जनहित याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी विनीता अहूजा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि भारी मात्रा में दूषित पानी मिलने से नदी में हानिकारक बैक्टीरिया, विशेष रूप से फीटल कालीफार्म पाया गया है। दलील दी गई कि ये बैक्टीरिया मानव और पशु मल-मूत्र के माध्यम से नदी के पानी में प्रवेश करते हैं, जो बिना किसी उपचार के प्रतिदिन जबलपुर स्थित नर्मदा नदी में बहाया जाता है।
नर्मदा में लगातार नुपचारित सीवेज, नगरपालिका अपशिष्ट और औद्योगिक अपशिष्टों को बहाया जा रहा है। चूंकि नर्मदा नदी एक बड़ी आबादी के लिए पेयजल का प्राथमिक स्रोत है, इसलिए इसके प्रदूषण से गंभीर स्वास्थ्य खतरा और पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। विशेषज्ञों द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि जबलपुर के जल में आमतौर पर क्षारीय (उच्च पीएच) पानी पाया जाता है। नर्मदा नदी और इसकी सहायक नदियों जैसे परियट में पीएच स्तर अक्सर आदर्श 8.5 सीमा से अधिक होता है।
जल जीवन मिशन के तहत किए गए आंकलन पर आधारित एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के 36.7 प्रतिशत नमूने असुरक्षित और पीने योग्य नहीं पाए गए हैं। हाल ही में, दूषित पेयजल के कारण हुए डायरिया के प्रकोप के बीच इंदौर में जल प्रदूषण संकट उत्पन्न हुआ, जहां करीब 30 लोगों की मृत्यु हो गई और कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जन स्वास्थ्य और सुरक्षा की रक्षा के लिए यथाशीघ्र आवश्यक कदम उठाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। याचिका में प्रदूषण की रोकथाम, अपशिष्ट उपचार सुनिश्चित करने, जन स्वास्थ्य की रक्षा करने और नर्मदा नदी की पारिस्थितिक अखंडता को बहाल करने मांग की गई है।

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