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मुंबई। प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन पर लगी रोक से जुड़े मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसके समक्ष विचाराधीन मुद्दा धार्मिक परंपराओं का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जल प्रदूषण का है। अदालत ने कहा कि वह किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का विरोध नहीं कर रही है और न ही किसी की धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप कर रही है। न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान अखिल गणेशोत्सव समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता उदय वारुंजीकर ने दलील दी कि हिंदू धर्म में गणेश प्रतिमा का जल में विसर्जन अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है और प्रतिमा का विसर्जन न करना धर्मशास्त्र के अनुरूप नहीं माना जाता। इस पर हाईकोर्ट ने सवाल किया कि क्या किसी धर्मग्रंथ या न्यायिक निर्णय में यह उल्लेख है कि गणेश प्रतिमा केवल पीओपी या शाडू मिट्टी की ही होनी चाहिए, उसकी ऊंचाई निर्धारित होनी चाहिए या उसका विसर्जन केवल प्राकृतिक जलस्रोतों में ही किया जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके समक्ष केवल यह प्रश्न है कि पीओपी से बनी प्रतिमाओं का प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन पर्यावरण और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है या नहीं। अधिवक्ता वारुंजीकर ने जवाब में कहा कि धर्मशास्त्र में केवल गणेश प्रतिमा के विसर्जन का उल्लेख है, प्रतिमा किस सामग्री से बने, इसका उल्लेख नहीं है। उन्होंने बताया कि पहले मिट्टी की प्रतिमाएं बनाई जाती थीं, बाद में शाडू मिट्टी और फिर पीओपी का उपयोग शुरू हुआ। हालांकि, उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रतिमा का विसर्जन जल में ही होना चाहिए। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने केरल के एक पुराने मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कुछ छात्रों ने धार्मिक आधार पर राष्ट्रगान गाने से इनकार किया था। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामला पूरी तरह अलग है और इसका संबंध केवल पर्यावरणीय प्रभाव से है। न्यायमूर्ति अजय गडकरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत यह नहीं कह रही कि पूजा-पाठ, फूल, अगरबत्ती या अन्य धार्मिक विधियां बंद कर दी जाएं। विवाद केवल छह फीट से अधिक ऊंचाई वाली पीओपी गणेश प्रतिमाओं के प्राकृतिक जलस्रोतों में विसर्जन और उससे होने वाले संभावित पर्यावरणीय नुकसान का है। सुनवाई के दौरान पीओपी मूर्तिकार संघ की ओर से यह भी दावा किया गया कि शाडू मिट्टी की प्रतिमाएं पीओपी से अधिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। उनका तर्क था कि शाडू मिट्टी पूरी तरह घुलती नहीं है और उसका गाद (सिल्ट) जलाशयों के तल में जमा होकर जल प्रवाह और भूजल पुनर्भरण को प्रभावित करता है। वहीं पीओपी प्रतिमाओं का विसर्जन के बाद पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) संभव है और अब तक यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है कि पीओपी स्वयं विषैला पदार्थ है। संघ ने अदालत का ध्यान प्रतिमाओं पर इस्तेमाल होने वाले रंगों की ओर भी दिलाया। उनका कहना था कि हर वर्ष लगभग 45 हजार लीटर रंग गणेश प्रतिमाओं पर उपयोग किया जाता है और वास्तविक प्रदूषण का बड़ा कारण यही रासायनिक रंग हैं।

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