सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा और सख्त संदेश, आम लोगों को मिलेगी राहत
गिरफ्तारी एक वैधानिक अधिकार जरूर है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं माना जा सकता – कोर्ट

नई दिल्ली। पुलिस गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त संदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस सिर्फ पूछताछ करने के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस हर मामले में उसे लागू करे। कोर्ट ने साफ किया कि जांच एजेंसियों को गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प के रूप में देखना चाहिए। यह फैसला आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए जब जांच को आगे बढ़ाने के लिए आरोपी को हिरासत में लेना जरूरी हो। कोर्ट ने पुलिस को यह भी याद दिलाया कि कानून में गिरफ्तारी से पहले नोटिस जारी करने का प्रावधान है और इसका पालन करना जरुरी है। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि गिरफ्तारी को पुलिस की सुविधा नहीं बल्कि जांच की जरूरत के आधार पर देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के बाद गिरफ्तारी के नियमों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एम एम सुंद्रेश और जस्टिस एन के सिंह की युगल पीठ ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस को पहले आरोपी को नोटिस देना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी एक वैधानिक अधिकार जरूर है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं माना जा सकता। पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले खुद से सवाल करना होगा कि क्या बिना गिरफ्तारी के जांच संभव है या नहीं।
वरिष्ठ वकील ने कोर्ट को बताया कि बीएनएसएस की धारा के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है और इसे केवल गिरफ्तारी के कारण दर्ज करके दरकिनार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया गिरफ्तारी के बिना भी आगे बढ़ सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए जब जांच प्रभावित होने की आशंका हो या आरोपी के भागने या सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना हो। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी का अधिकार पुलिस को दिया गया है लेकिन इसका इस्तेमाल सोच-समझकर करना होगा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के तहत सात साल तक की सजा वाले मामलों में पुलिस को आरोपी को पहले नोटिस देना जरूरी है। नोटिस के जरिए आरोपी को जांच में शामिल होने का मौका दिया जाता है। गिरफ्तारी तभी की जा सकती है जब आरोपी जांच में सहयोग नहीं करे, फरार होने की आशंका हो या सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा हो। इस फैसले से आम नागरिकों को बड़ी राहत मिल सकती है। इससे पुलिस द्वारा अनावश्यक गिरफ्तारी की घटनाओं पर रोक लगेगी। नागरिकों के मौलिक अधिकार मजबूत होंगे। साथ ही जांच एजेंसियों को भी पारदर्शी और संतुलित तरीके से काम करना होगा। यह फैसला न्याय व्यवस्था में भरोसा बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
