
बिल्डर ने उपभोक्ता कोर्ट में फ्लैट के खरीदार को नाकाम साबित किया था
नई दिल्ली। मेट्रो और टियर-1 शहरों में ज्यादातर लोग मकान और फ्लैट इसलिए भी बनाते हैं, ताकि उसे किराये पर देकर हर महीने आमदनी हासिल कर सकें, लेकिन इस प्रक्रिया में एक बड़ा पेंच था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुलझा दिया है। अगर फ्लैट खरीदने वाले ने उसे किराये पर दे दिया तो अब वह उपभोक्ता नहीं रह गया। इसी तथ्य को दावा बनाकर बिल्डर ने उपभोक्ता कोर्ट में फ्लैट के खरीदार को नाकाम साबित किया था, लेकिन बात जब सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को क्लीयर कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी रिहायशी फ्लैट को किराये पर या पट्टे पर देने से उसका खरीदार उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत ‘उपभोक्ता’ की श्रेणी से बाहर नहीं हो जाता। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने साफ किया कि किसी खरीदार को ‘वाणिज्यिक उद्देश्य’ के आधार पर उपभोक्ता की परिभाषा से बाहर करने के लिए बिल्डर को यह साबित करना होगा कि फ्लैट खरीदने का प्रमुख उद्देश्य व्यावसायिक था, न कि उसका खुद इस्तेमाल करना।
पीठ ने कहा कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ‘उपभोक्ता’ वह व्यक्ति है, जो किसी वस्तु को मूल्य देकर खरीदता है या सेवाएं हासिल करता है। हालांकि, पुनर्विक्रय या किसी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए सामान खरीदने वाला व्यक्ति इसकी परिभाषा से बाहर है। इस मामले में फ्लैट को पट्टे पर देने से यह नहीं पता चलता है कि अपीलकर्ता ने संपत्ति को प्रमुख रूप से वाणिज्यिक गतिविधि में संलग्न होने के उद्देश्य से खरीदा था। लिहाजा उसे उपभोक्ता की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता है।
पीठ ने यह भी कहा कि ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ हरेक मामले की परिस्थितियों के आधार पर तथ्यात्मक रूप से तय किया जाना चाहिए। यह आदेश विनीत बहरी की अपील पर पारित किया, जिन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें फ्लैट किराये पर दिए जाने को व्यावसायिक उद्देश्य मानते हुए उनकी शिकायत खारिज कर दी गई थी। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने भी उन्हें उपभोक्ता मानने से इनकार किया था और बिल्डर के हित में फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन मकान खरीदारों को राहत मिली है, जो अपने फ्लैट या मकान को किराये पर देकर आमदनी कमाते हैं। बिल्डर ने इस बात का फायदा उठाकर अपीलकर्ता के खिलाफ उपभोक्ता अदालतों में माहौल बनाया था कि उन्होंने यह फ्लैट खरीदा था किराये पर देकर पैसा कमाने के लिए। लिहाजा मकान में आई कमी के लिए उन्हें उपभोक्ता मानकर मुआवजा नहीं दिया जा सकता है। कोर्ट के फैसले से साफ हो गया है कि भले ही मकान खरीदने वाले ने उसे किराये पर दे दिया है, लेकिन उसके उपभोक्ता के हित फिर भी बने रहेंगे।
