
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी आरोपी को अदालत से जमानत मिल जाती है, तो उसे जेल में रखने के लिए बार-बार नई एफआईआर दर्ज करना कानून का दुरुपयोग है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह तरीका मौलिक अधिकार के तहत सीधे हस्तक्षेप की मांग करता है। यह मामला झारखंड का है। 20 मई 2025 को रांची के एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने 1988 के तहत पहली एफआईआर दर्ज की थी। इसी मामले में आरोपी से पूछताछ चल रही थी, तभी एसीबी हजारीबाग ने 2010 में कथित वन भूमि के म्यूटेशन से जुड़े मामले में दूसरी एफआईआर दर्ज कर दी। यह मामला करीब 15 साल पुरानी घटना से जुड़ा था। इसके बाद 2025 में दो और एफआईआर दर्ज की गई।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार जानबूझकर एक के बाद एक एफआईआर दर्ज कर रही है, ताकि जमानत मिलने के बावजूद आरोपी जेल में ही रहे। उनका कहना था कि यह कोर्ट के जमानत आदेश को बेअसर करने की सोची-समझी कोशिश है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी को जानबूझकर हिरासत में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 17 दिसंबर 2025 को जमानत मिलने के बाद भी 19 दिसंबर को एक अन्य एफआईआर में उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया और 20 दिसंबर को एक और मामले में सात दिन की रिमाड दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में डॉ आंबेडकर के उस कथन का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा बताया था।
