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नई दिल्ली। देश में नेताओं के भाषणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। मंगलवार को एक सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक नेताओं को देश में भाईचारा बढ़ाने का काम करना चाहिए। कोर्ट ने शिक्षाविद रूप रेखा वर्मा समेत 12 याचिकाकर्ताओं से राजनीतिक भाषणों पर दिशानिर्देश के लिए एक नई याचिका दाखिल करने को कहा है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच ने मौजूदा जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में नेताओं और मीडिया के लिए गाइडलाइन बनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कुछ नेताओं के भाषण भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करते हैं। याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए। उन्होंने कहा कि देश में माहौल जहरीला होता जा रहा है। यह याचिका असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के कथित हेट स्पीच के संदर्भ में दायर की गई थी। सिब्बल ने दलील दी कि किसी एक नेता के खिलाफ राहत नहीं मांगी जा रही है, बल्कि भाषणों में जवाबदेही तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने का अनुरोध किया गया है।
कोर्ट ने दी नई याचिका दाखिल करने की सलाह
हालांकि, बेंच कपिल सिब्बल की दलील से सहमत नहीं हुई। चीफ जस्टिस ने कहा कि यह याचिका एक खास राजनीतिक दल के कुछ चुनिंदा व्यक्तियों के खिलाफ दिखती है। उन्होंने कहा कि इसे वापस लें। एक दूसरी याचिका दायर करें जिसमें यह बताया जाए कि राजनीतिक दल कैसे नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह एक निष्पक्ष याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार है।
जस्टिस नागरत्ना ने की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि राजनीतिक नेताओं को देश में भाईचारा बढ़ाना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर हम गाइडलाइन बना भी दें, तो उनका पालन कौन करेगा? भाषण की उत्पत्ति विचारों से होती है। आप विचारों को कैसे नियंत्रित कर सकते हैं? हमें संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप विचारों को बढ़ावा देना होगा। कपिल सिब्बल ने चुनाव आचार संहिता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू होती है, लेकिन उससे पहले दिए गए भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में मीडिया की क्या जिम्मेदारी है ताकि लोकतांत्रिक माहौल खराब न हो। जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट केवल आदेश पारित कर सकता है, लेकिन उन्हें लागू करना एक चुनौती है। उन्होंने कहा कि हेट स्पीच को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई सिद्धांत तय कर चुका है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसमें राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी बनती है, क्योंकि नेता पार्टी का ही सदस्य होता है।

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