
दमोह : कलेक्टर एवं जिला समिति अध्यक्ष सुधीर कुमार कोचर ने कहा है केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अनुसार समस्त निजी/अशासकीय विद्यालयों हेतु कक्षा 09वीं से 12वीं में एनसीईआरटी/एससीईआरटी की पुस्तकों को लागू किया जाना अनिवार्य कर दिया गया है, जबकि कक्षा 01 से 8 वीं तक के लिये इन विद्यालयों में एनसीईआरटी/एससीईआरटी की पुस्तकें संचालित करने की सख्त सलाह (Strongly Advised) दी गई है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश निजी विद्यालय (फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम 2017 यथा संशोधित अधिनियम 2025 एवं इसके अंतर्गत नियम 2020 के नियम 6(1)(ग) में प्रावधान किया गया है कि ”निजी विद्यालय प्रबंधन द्वारा पाठ्य पुस्तकों का निर्धारण ऐसे सम्बद्धता बोर्ड अथवा परीक्षा निकाय के विनियमों के अनुसार किया जाएगा, जिससे कि वह सम्बद्ध है” जिले के 189 विद्यालयों द्वारा एनसीईआरटी/एससीईआरटी की पुस्तकें लागू किये जाने की लिखित सहमति पुस्तकों की सूची के साथ प्राप्त हो जाने पर जिला समिति के माध्यम से इनके अनुमति आदेश भी जारी किये जा चुके हैं।
दमोह जिले में संचालित 77 निजी विद्यालय ऐसे हैं जिनके द्वारा इस आशय का लिखित प्रस्ताव दिया गया है कि वे एनसीईआरटी/एससीईआरटी के अतिरिक्त कतिपय कक्षाओं के लिये निजी प्रकाशकों की पुस्तकें भी आगामी सत्र 2026-2027 से लागू करना चाहते हैं।
निजी प्रकाशकों की पुस्तकें गुणवत्ता के मापदण्ड पर खरी उतरती हैं या नहीं इस बारे में निजी विद्यालय कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं करा सके…………..
इसी अनुक्रम में कलेक्टर एवं जिला समिति अध्यक्ष सुधीर कुमार कोचर की अध्यक्षता में निजी विद्यालय प्राचार्य/प्रधानाध्यापकों के साथ एक बैठक आयोजित की गई । बैठक में निजी विद्यालयों द्वारा निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लागू करने के संबंध में तर्क दिये गये, निजी विद्यालयों द्वारा यह तर्क भी दिया गया कि उनके आकलन अनुसार एनसीईआरटी / एससीईआरटी की पुस्तकों की शैक्षणिक गुणवत्ता वर्तमान समय की आवश्यकता एवं प्रासंगिकता पर खरी नहीं उतरती है किन्तु इस संबंध में मांगे जाने पर निजी विद्यालय कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके कि उन्होनें यह आंकलन किस प्रकार किया है और इसका क्या ठोस आधार है? उल्लेखनीय है कि एनसीईआरटी/ एससीईआरटी की पुस्तकें बाल मनोविज्ञान के गहन शोध और विश्लेषण के आधार पर निर्मित की गई हैं और इसके तथ्यात्मक प्रमाण भी उपलबध हैं किन्तु निजी प्रकाशकों की पुस्तकें गुणवत्ता के मापदण्ड पर खरी उतरती हैं या नहीं इस बारे में निजी विद्यालय कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं करा सके।
विगत शैक्षणिक वर्ष में कलेक्टर एवंअध्यक्ष जिला समिति से चर्चा उपरांत बनी सामूहिक सहमति के आधार पर निजी विद्यालयों द्वारा सभी कक्षाओं के लिए एनसीईआरटी/ एससीईआरटी की पुस्तकें लागू की गई थीं किन्तु विद्यालय प्रबंधन एवं अभिभावकगणों को यह प्रतीत होता है कि शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान प्रतियोगी वातावरण एवं व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास एवं तार्किक बुद्धिमत्ता में वृद्धि हेतु एनसीईआरटी/ एससीईआरटी के अतिरिक्त अन्य पुस्तकों का पढ़ाया जाना आवश्यक है। कक्षा 9वीं से 12वीं तक एनसीईआरटी/एससीईआरटी की पुस्तकें एवं पाठयक्रम ही संचालित किया जा रहा है । उपरोक्त समस्त कारणों को आधार बनाकर निजी विद्यालयों द्वारा अनुरोध किया गया कि उनके प्रस्ताव को यथावत स्वीकार किया जावे।
एक विद्यालय सेंट जॉन्स सीनियर सेकेण्डरी स्कूल दमोह द्वारा समिति के समक्ष कक्षावार अभिभावकों के सहमति हस्ताक्षर संबंधी दस्तावेज अवलोकन कराये गये जिनमें अभिभावकों द्वारा कतिपय कक्षाओं के कतिपय विषयों के लिये निजी प्रकाशकों की पुस्तकों को लागू किये जाने के संबंध में लिखित सहमति दी गई है। विद्यालय प्रबंधन को समिति द्वारा उक्त दस्तावेजों की मूल प्रतियां उपलब्ध कराने के निर्देश दिये गये।
नर्सरी, केजी-1, और केजी-2 के 03 वर्षो के लिये एनसीईआरटी/एससीईआरटी की एक ही पुस्तक 3 वर्ष चलाई जाती है जबकि तीनों ही कक्षाओं में विद्यार्थी पृथक-पृथक पुस्तकों से पढ़ना पसंद करते हैं । साथ ही एक ही विषय वस्तु 3 वर्ष तक पढ़ाया जाना भी व्यवहारिक दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता है, क्योंकि किसी प्रकार का नवीन ज्ञान प्राप्त न होकर केवल दोहराव की स्थिति बनती है। सीबीएसई के मार्गदर्शी निर्देशों में कक्षा 01 से कक्षा 8 के लिये एनसीईआरटी/ एससीईआरटी की किताबें लागू करने की सख्त सलाह दी गई है किन्तु एनसीईआरटी/ एससीईआरटी की पुस्तकें अनिवार्य नहीं की गई हैं।
उल्लेखनीय है कि इस वर्ष इन अलग-अलग निजी विद्यालयों द्वारा एक ही कक्षा के अध्यापन के लिये अलग-अलग निजी प्रकाशकों की अलग-अलग पुस्तकें लागू करने का प्रस्ताव दिया गया है।
सभी निजी विद्यालय को सख्त सलाह दी गई है कि सभी कक्षाओं में निजी प्रकाशकों की पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी/एससीईआरटी की पुस्तकों को लागू करने का तत्काल निर्णय लें तथा विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों पर बिना किसी ठोस आधार के निजी प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशित मंहगी पुस्तकों का आर्थिक बोझ अधिरोपित ना किया जाये । इस आदेश के माध्यम से अभिभावकों और विद्यार्थियों से भी यह अपेक्षा की गई है कि वे आदेश में वर्णित तथ्यों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन कर निजी/ संगठन स्तर से निजी विद्यालय प्रबंधन से इस विषय में चर्चा करें कि विद्यार्थी हित में इस निर्णय पर पुर्नविचार किया जाये । यदि अभिभावक, विद्यालय प्रबंधन के इस निर्णय से सहमत नहीं है तो वे इस संबंध में अपने परिवार के विद्यार्थी का उक्त निजी विद्यालय में अध्ययन जारी रखने अथवा ना रखने के संबंध में समुचित निर्णय ले सकते हैं । अभिभावक इस विषय में सक्षम प्राधिकारी एवं सक्षम न्यायालय के समक्ष भी अपनी याचिका/अनुरोध प्रस्तुत कर सकते हैं ।
निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लागू होने की स्थिति में इन विद्यार्थियों के अभिभावकों को अत्यन्त महंगी पुस्तकें क्रय करने पर विवश होना पड़ेगा
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, दिनांक 01.04.2010 से प्रभावी हुआ जिसमें 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा (कक्षा 1 -8 को एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21।) बनाता है। यह कानून निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें वंचित समूह के लिए आरक्षित करता है और बिना किसी फीस के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करता है, जिले में अनुमानित 60 हजार विद्यार्थी कक्षा 1 से 8 में नामांकित है जिनमें से 25 प्रतिशत अर्थात लगभग 15 हजार विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से हैं जो निजी विद्यालयों में अध्ययनरत हैं जो सामान्यतः इन विद्यालयों द्वारा प्रस्तावित निजी प्रकाशकों की अत्याधिक महंगी पुस्तकों को खरीदने में समर्थ नहीं हैं ऐसी स्थिति में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लागू होने की स्थिति में इन विद्यार्थियों के अभिभावकों को अत्यन्त महंगी पुस्तकें क्रय करने पर विवश होना पड़ेगा। इससे मूलभूत उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा क्योंकि एक ओर जिस कारण फीस माफ हुई है वहीं दूसरी ओर आर्थिक बोझ पुस्तकें खरीदने के संदर्भ में अभिभावकों पर पड़ेगा जो न्यायोचित नहीं है।
कलेक्टर एवं जिला समिति अध्यक्ष श्री कोचर ने सभी चिन्हित विद्यालयों को निर्देशित किया है कि विद्यालय प्रबंधन अपने प्रस्ताव पर पुर्नविचार करते हुए निजी प्रकाशन की पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी/एससीईआरटी, पाठय पुस्तक निगम द्वारा मुद्रित पुस्तकों के माध्यम से अध्ययन-अध्यापन का कार्य शैक्षणिक सत्र 2026-2027 में करने का निर्णय लें यह निर्णय जिले में शिक्षा की गुणवत्ता और विद्यार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास में मील का पत्थर सिद्ध होगा ।
