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पुलिस ऑब्जर्वर ने बिना उचित आधार के बड़ी संख्या में लोगों को उपद्रवी बताया था
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदान से चंद घंटे पहले चुनाव आयोग को झटका लगा है। कोलकाता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले उपद्रवी बताए गए 800 लोगों के खिलाफ चुनाव आयोग के आदेश को पलट दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का सामूहिक आदेश नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन कर सकता है। चीफ जस्टिस सुजोय पाल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने माना कि पुलिस ऑब्जर्वर ने बिना उचित आधार के बड़ी संख्या में लोगों को उपद्रवी बता दिया गया है। कोर्ट ने 21 अप्रैल के इस आदेश पर 30 जून 2026 तक या अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एक पीएलआई वकील ने दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि इस आदेश से लोगों के मौलिक अधिकार, खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर वकील ने दलील दी कि चुनाव आयोग के पास किसी नागरिक को उपद्रवी घोषित करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि इस सूची में कई जनप्रतिनिधियों जैसे सांसद, विधायक, पार्षद और पंचायत सदस्य के नाम भी शामिल हैं।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से सीनियर वकील ने कहा कि आयोग का उद्देश्य सिर्फ स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराना है। उन्होंने दलील दी कि पुलिस को केवल कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करने को कहा गया था। 21 अप्रैल के आदेश में पुलिस ऑब्जर्वर ने राज्य के डीजीपी को निर्देश दिया था कि सूची में शामिल लोगों के खिलाफ प्रिवेंटिव एक्‍शन लिया जाए। आरोप लगाया गया था कि ये लोग मतदाताओं को डराने और चुनाव प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं। इस आदेश के बाद केंद्रीय बलों ने ‘ऑपरेशन ट्रस्ट’ के तहत कई इलाकों में जाकर लोगों को चेतावनी दी थी। मुर्शिदाबाद और बीरभूम जैसे जिलों में लाउडस्पीकर से लोगों से अपील की कि वे बिना डर के वोट डालें और किसी दबाव में न आएं।
इस बीच चुनाव आयोग ने मतदान के दिन बाइक प्रतिबंध के अपने फैसले में बदलाव किया है। अब ओला, उबर, जोमैटो, स्विगी जैसे डिलीवरी और सर्विस प्रोवाइडर्स तथा पहचान पत्रों के साथ ऑफिस जाने वाले लोग दोपहिया वाहन इस्तेमाल कर सकेंगे। आयोग ने पहले 6 बजे शाम से 6 बजे सुबह तक बाइक चलाने पर रोक लगाई गई थी। इसके अलावा आयोग ने मतदान से 48 घंटे पहले ‘बाहरी लोगों’ की मौजूदगी पर भी सख्ती दिखाई है। इस वजह से यहां का महौल बदला हुआ था।

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