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नई दिल्ली । सरकारी और निजी नौकरियों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी पद के लिए तय अधिकतम शैक्षणिक योग्यता से अधिक पढ़े-लिखे उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर सकते है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता को किसी पद के लिए न्यूनतम ही नहीं, बल्कि अधिकतम योग्यता तय करने का भी अधिकार है और ऐसा करना कानूनन उचित है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कुछ पदों के लिए योग्यता की ऊपरी सीमा निर्धारित करने के पीछे तर्क और न्यायसंगत उद्देश्य होता है। इसका मकसद उन लोगों को रोजगार के मौके उपलब्ध कराना है जो आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियों के कारण उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि राज्य एक आदर्श नियोक्ता के रूप में इसतरह के पदों को कम शैक्षणिक योग्यता वाले अभ्यर्थियों के लिए सुरक्षित रख सकता है। यदि अधिक शिक्षित उम्मीदवारों को भी इसतरह के पदों पर आवेदन और नियुक्ति की अनुमति दे दी जाए, तब अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखे लेकिन पात्र उम्मीदवारों के मौके प्रभावित हो सकते हैं। इससे भर्ती प्रक्रिया का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अदालतें पहले भी ऐसी नीतियों को वैध और उचित ठहरा चुकी हैं। इसलिए किसी विशेष पद के लिए तय शैक्षणिक सीमा का पालन अनिवार्य है और उससे अधिक योग्यता रखने वाले व्यक्ति को केवल इस आधार पर पात्र नहीं माना जा सकता कि वह नौकरी करने का इच्छुक है।
यह टिप्पणी एक बैंक कर्मचारी की बर्खास्तगी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। संबंधित कर्मचारी को नौकरी से इसलिए हटाया था क्योंकि नियुक्ति के समय उसने अपनी वास्तविक शैक्षणिक योग्यता छिपाई थी। पद के लिए शर्त थी कि उम्मीदवार कम से कम आठवीं पास हो, लेकिन 12वीं पास या उससे अधिक शिक्षित न हो। जांच में सामने आया कि कर्मचारी स्नातक था, इसके बाद उसकी सेवा समाप्त कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी को सही बताकर कहा कि कर्मचारी ने भर्ती नियमों का उल्लंघन किया था। अदालत ने माना कि मामले में सहानुभूति की गुंजाइश हो सकती है, लेकिन कानून और स्थापित नियमों के आधार पर हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं बनता।

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