
वे परिवार की नींव मजबूत करती हैं; उनके काम की कीमत हर महीने 30 हजार जितनी
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि गृहिणी को होममेकर के बजाय नेशन बिल्डर कहना चाहिए। कोर्ट की यह टिप्पणी दुर्घटना में महिला की मौत से जुड़े एक मुआवजा केस में आई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते उसके योगदान का आकलन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी का काम केवल खाना बनाना, बच्चों की देखभाल और घर संभालना नहीं है। वह परिवार की नींव को मजबूत बनाती है, अगली पीढ़ी तैयार करती है। इसके बाद जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दुर्घटना की शिकार गृहिणियों के मामले में एक नई गाइडलाइन जारी की। कोर्ट ने कहा कि एक गृहिणी के काम के लिए 30 हजार रुपए हर महीने के हिसाब से मुआवजा तय किया जाना चाहिए। यह मामला पंजाब की रेशमा नाम की महिला से जुड़ा है। उनकी मौत नवंबर 2001 में एक सडक़ हादसे में हुई थी। उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया था। ट्रिब्यूनल ने 2003 में फैसला दिया, लेकिन कानूनी लड़ाई वर्षों तक चलती रही। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस पर दिसंबर 2024 में फैसला सुनाया। हादसे के 23 साल बाद आए इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जताई।
मुआवजा तय करने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि यदि किसी सडक़ दुर्घटना में गृहिणी घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तो परिवार को केवल उसकी आय न होने के आधार पर कम मुआवजा नहीं दिया जा सकता। यानी सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम (एमवी एक्ट) के तहत दावों में पत्नी की घरेलू देखभाल के नुकसान को मुआवजे के एक अलग मद के रूप में मान्यता दे दी। बेंच ने मुआवजा तय करने के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत ने कहा कि गृहिणियों की आय का आकलन करते समय उनकी उम्र, एजुकेशन, स्किल, पारवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक हालात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
