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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी वकील अपने मुवक्किल की स्पष्ट और लिखित अनुमति के बिना उसकी ओर से किसी समझौते में शामिल नहीं हो सकता। इस फैसले का असर 37 साल पुराने एक पुश्तैनी संपत्ति बंटवारे के मुकदमे पर पड़ा है, जिसमें अब नए सिरे से ट्रायल शुरू होगा।
यह मामला वर्ष 1989 में दायर पुश्तैनी संपत्ति बंटवारे के मुकदमे से जुड़ा है। फरवरी 1994 में, ट्रायल कोर्ट ने पक्षकारों की ओर से संयुक्त रूप से दायर आवेदन के आधार पर समझौता डिक्री पारित की थी, इसके बाद 1997 में अंतिम डिक्री भी जारी हुई थी। हालांकि, करीब 28 साल बाद, एक प्रतिवादी के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस समझौता डिक्री को यह कहकर चुनौती दी कि उनके पूर्वज ने कभी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे और न ही किसी वकील को उनकी ओर से समझौता करने का अधिकार दिया था। उन्होंने वकालतनामा और लिखित बयान के फर्जी होने का भी आरोप लगाया था।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि वर्ष 1976 में सिविल प्रक्रिया संहिता में संशोधन के बाद, कानूनी प्रावधान स्पष्ट है, समझौता डिक्री के लिए यह अनिवार्य है कि समझौता लिखित हो और उस पर सभी पक्षकारों के हस्ताक्षर हों। अदालत ने जोर दिया कि वकीलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने मुवक्किल के निर्देशों का पालन करें और रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी ने अपने अधिवक्ता को समझौते पर हस्ताक्षर करने की स्पष्ट अनुमति दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने इन आरोपों को स्वीकार करते हुए समझौता डिक्री को रद्द कर दिया था, जिसे बाद में पटना हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब क्लाइंट की स्पष्ट सहमति का अभाव हो, समझौते को वैध नहीं माना जा सकता। इसलिए, इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का अब पूर्ण ट्रायल होना आवश्यक है, जिससे पक्षकारों को न्याय मिल सके।

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