ट्रेन हादसे के पीड़ित परिवार को 10 साल बाद 8 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सेकेंड क्लास शब्द का संबंध रेलवे कोच से है, किसी यात्री की सामाजिक या आर्थिक श्रेणी से नहीं। अदालत ने कहा कि किसी यात्री की हैसियत उसके द्वारा खरीदे गए टिकट से नहीं आंकी जा सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसलों को पलटते हुए ट्रेन हादसे में मृत यात्री के परिवार को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जारी करने के निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया गया तो दावा दायर किए जाने की तिथि से 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह मामला नवंबर 2015 का है, जब मध्य प्रदेश के चंद्रकांत ठक्कर रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान अहमदाबाद-हावड़ा मेल से गिर गए थे, जिससे उनकी मौत हो गई। दुर्घटना के बाद उनका बैग भी गायब हो गया, जिसमें टिकट होने की बात कही गई थी। टिकट बरामद न होने के आधार पर रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उन्हें बोना फाइड यात्री मानने से इनकार करते हुए मुआवजा देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन दोनों फैसलों को निरस्त करते हुए मृतक की पत्नी लता ठक्कर को मुआवजा देने का निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे दुर्घटना मुआवजा कानून एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी संकीर्ण नहीं बल्कि उदार व्याख्या की जानी चाहिए। केवल टिकट बरामद न होने से किसी व्यक्ति का वैध यात्री होने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। यदि दावेदार शपथपत्र और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना प्रारंभिक दावा प्रस्तुत करता है, तो उसे गलत साबित करने की जिम्मेदारी रेलवे की होगी।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यात्रियों को अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। चलती ट्रेन पकड़ने, दरवाजे पर लटककर यात्रा करने और अन्य जोखिमपूर्ण व्यवहार से बचने की सलाह देते हुए कोर्ट ने रेलवे को भीड़भाड़ रोकने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और पर्याप्त स्टाफ नियुक्त करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि यात्रियों की सुरक्षा और सहायता व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सके।
