
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि 16 से 18 वर्ष के बीच का कोई नाबालिग ऐसा अपराध करता है, जो किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, तो उसे वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, यह निर्णय स्वतः लागू नहीं होगा और कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल जघन्य अपराध का आरोप लगना पर्याप्त नहीं है। पहले किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) प्रारंभिक आकलन करेगा कि आरोपी की मानसिक और शारीरिक परिपक्वता, अपराध को समझने की क्षमता तथा अपराध की परिस्थितियां क्या थीं। इसके बाद बाल न्यायालय (चिल्ड्रन्स कोर्ट) भी स्वतंत्र रूप से कारणयुक्त आदेश पारित करेगा कि मुकदमा वयस्क की तरह चलेगा या नहीं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि चिल्ड्रन्स कोर्ट बिना स्वतंत्र मूल्यांकन और कारणयुक्त आदेश के सीधे वयस्क की तरह मुकदमा शुरू कर देती है, तो पूरी सुनवाई ही कानूनी रूप से अमान्य हो सकती है। इस प्रकार न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिगों के मामलों में कानूनी प्रक्रिया और उनके अधिकारों की सुरक्षा सर्वोपरि है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में हत्या जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े किशोर मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि जघन्य अपराधों में नाबालिगों पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने का प्रावधान मौजूद है, लेकिन इसके लिए कानून द्वारा निर्धारित सभी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन करना आवश्यक होगा।
