हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने राज्य सरकार से पूछा

ग्वालियर । मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने राज्य सरकार से मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 की संवैधानिकता पर सवाल उठा दिया है। पूर्व गृहमंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई कर कोर्ट ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सहित ग्वालियर-चंबल अंचल के छह जिलों (ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना, श्योपुर) के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। ग्वालियर कोर्ट ने पूछा है कि इस 45 साल पुराने कानून को खत्म क्यों न किया जाए, और सभी को चार सप्ताह में अपना जवाब देना है। याचिका में इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर निरस्त करने की मांग की गई है।
डॉ. सिंह ने अपनी याचिका में दावा किया है कि 2020 से अब तक विशेष कानून के तहत एक हजार से अधिक लोगों पर एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं, जबकि इसी अवधि में विधानसभा में तत्कालीन गृह मंत्री यह स्वीकार कर चुके हैं कि प्रदेश में कोई भी सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय नहीं है। यह कानून मूल रूप से अक्टूबर 1981 में ग्वालियर-चंबल, सतना और पन्ना के बीहड़ों में डकैतों के आतंक, अपहरण और सामूहिक हत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए बनाया था, जिसमें कड़ी सजा और विशेष अदालतों में सुनवाई का प्रावधान था।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि जिन परिस्थितियों में कानून बनाया गया था, वे अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। इसके बावजूद, पुलिस सामान्य विवादों, मारपीट या जमीन संबंधी छोटे-मोटे झगड़ों में भी इसकी धारा 11 और 13 जोड़ देती है। इससे निर्दोष नागरिकों को अग्रिम जमानत नहीं मिल पाती, जो संविधान में प्रदत्त समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव शर्मा ने कोर्ट को बताया कि जब सरकार खुद मानती है कि डकैत गिरोह सक्रिय नहीं हैं, तब इस कानून को लागू रखना पूरी तरह अप्रासंगिक है और यह मासूम ग्रामीणों, किसानों और युवाओं को फंसाने का जरिया बन गया है।
